Saturday, 22 July 2017

रिव्यू-मस्त मुन्ना चुस्त माइकल

-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
माइकल को कूड़े के ढेर में मिला था मुन्ना। मुन्ना डांस और एक्शन में माहिर है। वह झगड़ा नहीं करता, सिर्फ पीटता है। दिल्ली के दबंग महेंदर को डांस सिखाते, उसकी जान बचाते और उसके लिए डॉली को पटाते वह खुद डॉली से प्यार कर बैठता है। जाहिर है अब महेंदर उसे छोड़ेगा नहीं और मुन्ना चूंकि हीरो है तो हार मानेगा नहीं।

कह सकते हैं कि अस्सी के दशक की इस घिसी-पिटी कहानी में नया तो कुछ भी नहीं है। पूछ सकते हैं कि फिर इसमें क्या खास परोसा है डायरेक्टर ने? तो जवाब है-कुछ भी नहीं। जी हां, तो इसकी कहानी, स्क्रिप्ट और ही डायरेक्शन में नयापन है। और यह फिल्म ऐसा कुछ होने का दावा या दिखावा करती भी नहीं है। यह सीधे-सीधे आपको पुरानी मसाला फिल्मों के दौर के घिसे-पिटे फॉर्मूले परोसती है और यही इसकी खासियत भी है कि इसमें कुछ भी खास होने के बावजूद यह मनोरंजन की खुराक कम नहीं होने देती। हां, दिमाग लगाने वाले, नयापन तलाशने वाले, किसी मैसेज-तालीम की उम्मीद रखने वाले, खुद को बुद्धिजीवी दर्शा कर फिल्म में मीनमेख निकालने वाले तो उस थिएटर के सामने से भी गुजरें जहां यह फिल्म लगी हो। सच तो यह है कि यह उन दर्शकों, थिएटरों की फिल्म है जहां हीरो की एंट्री पर, उसके एक-एक घूंसे पर, हीरोइन के एक-एक ठुमके पर सीटियां पड़ती है।

अब तक की अपनी तीनों फिल्मों-कमबख्त इश्क’, ‘हीरोपंतीऔर बागीमें निर्देशक सब्बीर खान ने साऊथ की फिल्मों की नकल की। इस बार उन्होंने गोविंदा, मिथुन चक्रवर्ती के दौर की फिल्मों पर हाथ साफ किया है। सलीकेदार फिल्मों की बजाय मसालों का घोल बनाना उन्हें पसंद है और इस फिल्म में भी वह आम दर्शकों को वह घोल आसानी से पिला देते हैं। टाईगर श्रॉफ लगातार ऐसे ही रोल करते रहे हैं। भाई, अब तो कुछ नया देना शुरू कर दो। निधि अग्रवाल के पास खूबसूरत चेहरा और दिलकश फिगर है। फिलहाल इसी से काम चलाइए और आंखों को राहत पहुंचाइए। नवाजुद्दीन सिद्दिकी और पंकज त्रिपाठी जैसे समर्थ अभिनेताओं को ऐसे रोल में देखना अजीब भले लगे लेकिन अगर ये लोग ऐसे एक्सपेरिमैंट नहीं करेंगे तो एक दायरे में बंध जाएंगे और वह इनके लिए ज्यादा खतरनाक होगा। एक्शन, गाने, डांस, सब अपनी-अपनी जगह फिट हैं। बिना कोई सवाल उठाए इसे देखेंगे तो मजा लूटेंगे। सवाल उठाए बिना रह पाएं तो घर बैठें, बेहतर होगा।
अपनी रेटिंग-ढाई स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने सिनेयात्राब्लॉग के अलावा समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

Friday, 21 July 2017

रिव्यू-खोखले हैं ये लिपस्टिक वाले सपने

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
 पुराने भोपाल के एक मौहल्ले की चार औरतें। बुर्के बेचने वाले मुस्लिम परिवार की कॉलेज जाने वाली रिहाना (प्लविता बोरठाकुर) घर के बंद माहौल से परे ऊंचा उड़ने के लिए जींस का हक, जीने का हकउसका नारा है। अपनी मर्जी के खिलाफ शादी करने को तैयार लीला (आहाना कुमरा) अपने आशिक फोटोग्राफर के साथ मिल कर कोई बड़ा काम करना चाहती है। अपने पति से दबने वाली तीन बच्चों की मां शाहीन (कोंकणा सेन शर्मा) पति से छुप कर नौकरी करती है। मौहल्ले की उषा बुआ जी (रत्ना पाठक शाह) सबसे छुप कर स्विमिंग सीखती है, अपने युवा स्विमिंग कोच में अपने प्रेमी को तलाशती है और उससे फोन पर सैक्सी-बातें करती है।

टर्निंग 30’ बना चुकीं अलंकृता श्रीवास्तव की पिछली फिल्म की तरह यह फिल्म लिपस्टिक
अंडर माई बुर्काभी नारीमुक्ति का झंडा बुलंद करती है। इन चार औरतों की निजी दुनिया में झांकने के बरअक्स यह फिल्म काफी कुछ ऐसा कह जाती है जिस पर बात करने से फिल्मकार ही नहीं, यह समाज और खुद औरतें तक भी बचती हैं। एक संवाद इसमें है-हमारी गलती यह है कि हम सपने देखती हैं।दरअसल यह फिल्म इन औरतों के इन लिपस्टिक वाले रंगीन सपनों के बहाने से दुनिया की तमाम औरतों की उन अधूरी, दबी हुई इच्छाओं को दिखाती चलती है जिन्हें कभी घर-परिवार की इज्जत तो कभी लोग क्या कहेंगेकी आड़ लेकर पूरा नहीं होने दिया गया।

लेकिन अपने जमीनी और वास्तविक लगते कलेवर से लुभाने वाली यह फिल्म अपने फ्लेवर से प्रभावित नहीं कर पाती। इन औरतों के बागी तेवर सिर्फ बाहर वालों के प्रति हैं जबकि इन्हें असल प्रताड़ना घर से मिल रही है। आजादी इन्हें दरअसल अपने घर में चाहिए लेकिन ये इसे तलाश बाहर जाकर रही हैं। क्लाइमैक्स में बिना कोई दमदार बात किए फिल्म का अचानक खत्म हो जाना इसके असल मकसद को ही बेकार कर देता है और सवाल उठता है कि क्या फ्री-सैक्स, शराब-सिगरेट, फटी जींस और अंग्रेजी म्यूजिक अपनाने भर से औरतें आजाद हो जाएंगी? आजादी के ये प्रतीक क्या इसलिए कि यही सब पुरुष करता है? अगर ऐसा है तो फिर औरत यहां भी तो मर्द की पिछलग्गू ही हुईं? फिल्मकारों को नारीमुक्ति की इस उथली और खोखली बहस से उठने की जरूरत है।

चारों अभिनेत्रियां अपने-अपने किरदारों में उम्दा अभिनय करती दिखाई दी हैं। कोंकणा सिर्फ चेहरे के भावों से कुछ भी कह सकने में सिद्धहस्त हैं। सुशांत सिंह जैसे समर्थ अभिनेता को फिल्म व्यर्थ कर देती है। सेंसर में फंसने और ढेरों फिल्मोत्सवों में जाने के बाद चर्चित हुई यह फिल्म हट करवाले मिजाज का सिनेमा देखने वालों के लिए है लेकिन इससे कोई बहुत सार्थक उम्मीद रखना बेमानी होगा।
अपनी रेटिंग-ढाई स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने सिनेयात्राब्लॉग के अलावा समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

Friday, 14 July 2017

रिव्यू-लुभाती है सुहाती है जग्गा की जासूसी

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
मुमकिन है यह सवाल आपके मन में भी कभी उठता हो कि कश्मीर हो, उत्तर-पूर्व या मध्य भारत का नक्सली इलाका, वहां के अलगाववादियों से लेकर दुनिया की वे तमाम जगहें, जहां हथियारबंद आतंकी मौजूद हैं, आखिर ये हथियार कोई तो पहुंचाता ही होगा। यह फिल्म ऐसे ही एक गैंग का पर्दाफाश करती है।