कोरियाई फिल्में अब हिन्दी वालों को ज्यादा भा रही हैं। 2013 में आई दक्षिण कोरियाई फिल्म ‘मोंटाज’ का रीमेक ‘तीन’ एक सस्पैंस फिल्म है। एक बूढ़ा आठ साल पहले किडनैप हुई और फिर मारी गई अपनी नातिन के किडनैपर की खोज में अभी भी पागलों की तरह लगा हुआ है जबकि पुलिस इस केस से पल्ला झाड़ चुकी है और इस केस को देख रहा अफसर पुलिस की नौकरी छोड़ अब चर्च में पादरी बन चुका है। लेकिन नाना का कहना है कि वह इंसाफ मिलने तक चुप नहीं बैठेगा। अचानक शहर में एक और बच्चा किडनैप होता है। बिल्कुल उसी स्टाइल में और उसके बाद के तमाम वाकये भी वैसे ही घटते हैं जो आठ साल पहले हो रहे थे। आखिर राज़ खुलता है और सच सामने आ ही जाता है।
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Thursday, 10 June 2021
Sunday, 9 August 2020
रिव्यू-चरमराते रिश्तों का सस्पैंस सुलझाती ‘रात अकेली है’
शहर के प्रतिष्ठित रईस ठाकुर रघुबीर सिंह का कत्ल हुआ है। उन्हीं के घर में, उन्हीं की बंदूक से, उन्हीं के परिवार के बीच। उनकी दूसरी शादी की रात को। ज़ाहिर है कि कातिल कोई घर का ही आदमी है। या फिर कोई औरत...? वो औरत, जो कल तक उनकी रखैल थी और आज शादी के बाद ठकुराईन? कत्ल की तफ्तीश इंस्पैक्टर जटिल यादव के ज़िम्मे है। नाम का जटिल लेकिन सुलझी हुई सोच वाला एक ऐसा इंसान जो सच को कहीं से भी खोद कर निकालने की हिम्मत और कुव्वत रखता है। पर क्या जटिल सुलझा पाएगा इस केस को, जिसके धागे खुलेंगे तो कइयों की नंगई सामने आएगी?Monday, 24 June 2019
ओल्ड रिव्यू-रमन राघव-न काला न सफेद
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
मुबारक हो, अनुराग कश्यप लौट आए हैं। वही अनुराग जो जिंदगी के, इंसानी मन के और समाज के अंधेरे कोनों को दिखाने में महारथ रखते हैं।
मुबारक हो, अनुराग कश्यप लौट आए हैं। वही अनुराग जो जिंदगी के, इंसानी मन के और समाज के अंधेरे कोनों को दिखाने में महारथ रखते हैं।
एक साइको किलर। किसी को भी किसी भी वजह से या बेवजह मारने वाला।
एक पुलिस अफसर। नशेड़ी। कभी भी किसी को भी मारने वाला।
क्या फर्क है दोनों में? एक अपराधी है और दूसरा मकसद से मार रहा है? नहीं। यहां अपराधी और पुलिस का फर्क नहीं है। पहला खुलेआम मार रहा है, दूसरा वर्दी की आड़ में। पहले को दूसरे की तलाश है और दूसरे को पहले की। पर क्यों?
Saturday, 16 March 2019
रिव्यू-अरमान जगाती ‘फोटोग्राफ’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
‘मैडम,
बरसों बाद जब आप यह फोटो देखेंगी तो आपको अपने चेहरे पर यही धूप दिखाई देगी...।’
मैडम तो फोटो खिंचवा कर चली गई। गांव में बैठी अपनी दादी को बहलाने के लिए फोटोग्राफर ने इसी मैडम की तस्वीर दादी को भेज दी कि मैंने अपने लिए यह लड़की पसंद कर रखी है। उसी वक्त पीछे ‘नूरी’ फिल्म का गाना बज रहा था, सो लड़की का नाम भी बता दिया-नूरी। लेकिन दादी गांव से उठ कर सीधे मुंबई आ धमकी-मिलवाओ नूरी से। फोटोग्राफर के कहने पर मैडम मान गई, दादी से मिलती रही और कहानी आगे चलती रही।
Sunday, 10 March 2019
ओल्ड रिव्यू-उलझे ताने-बाने सुलझाती ‘कहानी’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
एक कहानी में कितनी सच्चाई और कितनी कल्पना होती है?
क्या एक कहानी पूरी तरह से सच हो सकती है? या फिर क्या एक सच असल में कहानी हो सकता है? जितने उलझे हुए ये सवाल हैं लगभग उतने ही उलझे हुए ताने-बाने हैं इस फिल्म की कहानी के। लेकिन जब ये खुलते हैं तो सब सुलझ जाता है। आप इसे देख कर खाली हाथ नहीं लौटते हैं और यही एक कहानी की सफलता है कि जब आप कुछ पढ़ें या देखें तो आपको कुछ हासिल हो।
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