Sunday, 9 August 2020

रिव्यू-चरमराते रिश्तों का सस्पैंस सुलझाती ‘रात अकेली है’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
शहर के प्रतिष्ठित रईस ठाकुर रघुबीर सिंह का कत्ल हुआ है। उन्हीं के घर में, उन्हीं की बंदूक से, उन्हीं के परिवार के बीच। उनकी दूसरी शादी की रात को। ज़ाहिर है कि कातिल कोई घर का ही आदमी है। या फिर कोई औरत...? वो औरत, जो कल तक उनकी रखैल थी और आज शादी के बाद ठकुराईन? कत्ल की तफ्तीश इंस्पैक्टर जटिल यादव के ज़िम्मे है। नाम का जटिल लेकिन सुलझी हुई सोच वाला एक ऐसा इंसान जो सच को कहीं से भी खोद कर निकालने की हिम्मत और कुव्वत रखता है। पर क्या जटिल सुलझा पाएगा इस केस को, जिसके धागे खुलेंगे तो कइयों की नंगई सामने आएगी?

Saturday, 8 August 2020

यात्रा-पटनीटॉप में डरते-डरते किए मज़े (भाग-9)

-दीपक दुआ...
पिछले आलेख में आपने पढ़ा कि कटरा से चल कर उधमपुर के जखानी पार्क में घूमने और कुद का मशहूर व स्वादिष्ट ‘प्रेम पतीसा’ खाते हुए हम लोग पटनीटॉप की एक बड़ी-सी कॉटेज में पहुंच चुके थे। हमारे पास पूरे 24 घंटे थे और यहां घूमने के लिए इतना वक्त काफी था। लेकिन हमें क्या पता था कि हमारे अरमानों पर ‘पानी’ पड़ने वाला था (पिछला आलेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)। कॉटेज में सामान रख कर हम लोग फौरन बाहर आ गए ताकि लंच करके घूमने निकल सकें। यहां पर एक कॉटेज से दूसरा कॉटेज कम से कम दो सौ मीटर दूर था। ठीक सामने एक बड़ा मैदान था जिसमें दो-तीन अस्थाई दुकानें सजी हुई हैं। एक कश्मीरी ड्रैस में फोटो खींचने वाले की दुकान थी और एक-दो शॉल-सूट बेचने वालों की। अभी हम यहां का जायज़ा लेते हुए फोटो खींच ही रहे थे कि मैदान के उस पार खड़े घोड़े वाले हमारे पास आकर हमें जंगल की सैर करने के लिए मनाने लग गए। हमने मना किया तो उनमें से एक बोला-सर आप लोग आते हो तो हमारे बच्चे रोटी खाते हैं। अभी सीज़न नहीं है तो सुबह से खाली बैठे हैं। उसकी इस इमोशनल ब्लैकमेलिंग ने असर किया और श्रीमती का आदेश पा कर हम चार जने तीन घोड़ों पर सवार होकर जंगल की सैर पर चल दिए।

Friday, 7 August 2020

यात्रा-उधमपुर का जखानी पार्क और कुद का प्रेम-पतीसा (भाग-8)

-दीपक दुआ...
पिछले आलेख में आपने पढ़ा कि कटरा के आसपास काफी घूमने के बाद अब हम लोग पटनीटॉप जाने के लिए तैयार हो चुके थे। पटनीटॉप दरअसल कटरा से करीब 85 किलोमीटर दूर जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर एक छोटा-सा हिल-स्टेशन है। (पिछला आलेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) पहले यह जगह ज़्यादा मशहूर नहीं थी लेकिन 90 के दशक में कश्मीर घाटी में बढ़ते आतंकवाद के बाद इसे एक वैकल्पिक हिल-स्टेशन के तौर पर विकसित किया गया और धीरे-धीरे यह मशहूर होता चला गया। मैं यहां पहली बार 1998 में अपने दोस्त विपुल के साथ आया था। तभी से मेरी तमन्ना थी कि कभी इस जगह पर एक रात गुज़ारी जाए। अभी भी बहुत सारे लोग टैक्सी या टूरिस्ट बसों द्वारा कटरा से सुबह चल कर यहां आते हैं और शाम तक यहां से लौट जाते हैं। लेकिन हमें तो यहां भरपूर आनंद लेना था।

Thursday, 6 August 2020

यात्रा-धनसर बाबा-सिहाड़ बाबा और पटनीटॉप की तैयारी (भाग-7)

-दीपक दुआ...
धनसर बाबा
पिछले आलेख में आपने पढ़ा कि हम लोग कटरा से गाड़ी करके निकले तो ‘बाबा जित्तो’ और ‘नौ देवी’ के दर्शन कर चुके थे। अब हमें ‘धनसर बाबा’ पहुंचना था। कटरा के आसपास की तमाम जगहों में से यह मेरी पसंदीदा जगह है और यहीं पर बरसों पहले मेरी दोस्ती अनिल से हुई थी जिसका ज़िक्र मैंने पिछले आलेख में किया था। (पिछला आलेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) धनसर बाबा का मंदिर कटरा से करीब 12 किलोमीटर दूर है। मुख्य सड़क से करीब दो सौ मीटर सीढ़ियां उतर कर जाना पड़ता है। स्थानीय लोगों में इस मंदिर की बहुत मान्यता है। माना जाता है धनसर बाबा भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। यहां पर गुफा के अंदर व ऊपर से हर समय जहां-तहां पानी गिरता रहता है जो इतना साफ और सुरम्य है कि मन करता है, इसे देखते ही रहें। यहां हमने एक वीडियो भी बनाया जिसे देखने के लिए यहां क्लिक करें। यह पानी बहता हुआ नीचे उसी छोटी-सी धारा में जा मिलता है जो पीछे नौ देवी की तरफ से आती है। इसमें काफी लोग स्नान भी करते हैं। यहां एक छोटी-सी कैंटीन भी है। यह जगह इतनी शांत और सुहानी है कि यहां घंटों बैठे रहने को दिल चाहता है।

Wednesday, 5 August 2020

यात्रा-कटरा में बिताइए दो दिन, मज़ा आएगा (भाग-6)

-दीपक दुआ...
पिछले आलेख में आपने पढ़ा कि सांझी छत से मात्र 4 मिनट की अपनी हैलीकॉप्टर यात्रा ने मेरी कैसी तो बुरी हालत कर दी थी। कटरा बस स्टैंड के पास स्थित मेरे फेवरेट ‘ज्वैल्स’ रेस्टोरैंट में लंच करने के बाद हम लोग अपने होटल में आकर सो गए और फिर शाम को अपने होटल से सटे हुए एक पार्क में टहलने जा पहुंचे। यह एक बहुत बड़ा और खूबसूरत पार्क है जो चिंतामणि मंदिर के सामने है। (पिछला आलेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें) इसके बाद हम लोग चिंतामणि मंदिर में जा पहुंचे। यह कटरा का एक बहुत ही विशाल मंदिर है जिसमें रहने के लिए भी काफी सारे कमरे हैं। वैष्णो देवी की यात्रा में बसें भर-भर कर ले जाने वाली बहुत सारी संस्थाएं अपने यात्रियों को यहीं ठहराती हैं। अब मुझे अपने दोस्त अनिल से मिलना था जिसकी वहीं पास ही में अखरोट आदि की दुकान है। अनिल से मेरी दोस्ती कुछ साल पहले यहीं कटरा में हुई थी और उसके बाद से मैं जब भी यहां गया मैंने अखरोट उसी से खरीदे। जम्मू-कटरा में अखरोट को लेकर ठगने के काफी मामले सामने आते हैं कि दुकानदार ने दिखाए तो वे अखरोट जो हाथ में लेते ही टूट जाएं लेकिन घर पहुंच कर थैले में से निकले ऐसे अखरोट, कि हथोड़ी टूट जाए मगर अखरोट नहीं। अपने साथ यह ठगी 1996 में हो चुकी थी जिसके बाद 1998 में कटरा के एक दुकानदार से दोस्ती हुई और बरसों तक उनसे मिलना-जुलना व अखरोट खरीदने का सिलसिला चलता रहा। फिर उन्होंने अपना काम बदल लिया जिसके बाद संयोग से अनिल से दोस्ती हो गई। अनिल से जिस जगह पर मेरी दोस्ती हुई थी, वो जगह कटरा के करीब ही है और मेरी पसंदीदा जगहों में से है। यहां मैं हर बार ज़रूर जाता हूं। इस बार भी गया। आगे उसका भी ज़िक्र करूंगा।