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Friday, 25 December 2020

रिव्यू-एंटरटेमैंट का बोझ नहीं उठा पाई ‘कुली नं. 1’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पहला सीन-गोआ के एक रईस ईसाई बिज़नेसमैन जैफ्री रोज़ारियो की बेटी के लिए एक हिन्दू पंडित
रिश्ता लेकर आया हुआ है। (आप चाहें तो सिर्फ इस बेतुके सीन को देखने के बाद ही इस फिल्म को बंद करके किचन में पत्नी की या होमवर्क में बच्चों की मदद करने जैसा कोई सार्थक काम कर सकते हैं। इस रिव्यू को भी आगे न पढ़ने का फैसला आप यहीं
, इसी वक्त ले सकते हैं। नहीं...? चलिए, आपकी मर्ज़ी, हमें क्या, पढ़िए...) हां, तो जैफ्री उस पंडित की बेइज़्ज़ती करता है और पंडित मुंबई सैंट्रल रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने वाले राजू को महा-रईस बता कर उसका रिश्ता जैफ्री की बेटी से करवा देता है। ज़ाहिर है इस कहानी में कई उलझने होंगी जो अंत तक सुलझ ही जाएंगी।

Friday, 29 September 2017

रिव्यू-‘जुड़वा 2’-देख लीजिए नौ से बारह...


-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
1997 में आई सलमान खान वाली जुड़वा’ (ज़्यादातर लोग इस शब्द को जुड़वांबोलते हैं) की कहानी सब जानते हैं। एक परिवार में जन्मे दो जुड़वा लड़के पैदा होते ही विलेन की कारस्तानी से बिछड़ गए। एक स्ट्रीट स्मार्ट बना तो दूसरा सोफिस्टिकेटिड। पास-पास होते तो जो हरकत एक करता, दूसरे के साथ भी वैसा ही होने लगता। बड़े हुए तो इनकी जिंदगी में लड़कियां भी आईं और विलेन भी। नाचते-गाते, चूमते-चाटते, मारते-पीटते इन्होंने हमारा जम कर मनोरंजन किया था।

जुड़वा’ 1994 में आई नागार्जुन वाली तेलुगू फिल्म हैलो ब्रदरका रीमेक थी। यह अलग बात है कि हैलो ब्रदर’ 1992 में आई जैकी चान की फिल्म ट्विन ड्रैगन्सकी कॉपी थी। खैर, ‘जुड़वाके डायरेक्टर डेविड धवन अपनी उसी फिल्म की कहानी पर जुड़वा 2’ लेकर आए हैं जिसमें नएपन के नाम पर आज के चमकते, चॉकलेटी चेहरे हैं, आपको हंसाने के लिए हिट फिल्मों के रेफरेंस से गढ़े गए सीन और संवाद हैं, लंदन की दिलकश लोकेशन है। बाकी, वे तमाम मसाले तो हैं ही जिन्हें अपनी फिल्मों में छिड़क कर डेविड धवन दर्शकों को ऐसा मनोरंजन परोसते आए हैं जो आपको तमाम फिक्र-चिंताएं भुला कर ढाई घंटे तक एक अलग ही दुनिया में ले जाता है।

ऐसी फिल्मों में स्क्रिप्ट और स्पीड पर ही खासा जोर रहता है। इस फिल्म में यूनुस सजावल की स्क्रिप्ट ने इंटरवल तक तो जम कर मोर्चा बांधे रखा लेकिन उसके बाद यह कहीं-कहीं ढीली और अतार्किक हुई तो साजिद-फरहद के संवादों ने उसे संभाल लिया। फिर डेविड ने रफ्तार कहीं कम नहीं होने दी और बचा-खुचा काम एडिटर ने संभाल लिया।

वरुण धवन ऐसी भूमिकाओं में जंचते आए हैं। पापा डेविड के ही साथ वह मैं तेरा हीरोजैसी मस्त फिल्म दे चुके हैं और इस बार भी उन्होंने वैसी ही रंगत बिखेरी है। बल्कि मैं तो यहां तक कहूंगा कि सलमान खान की गुड लुक्स और उनके छिछोरे किरदारों वाली इमेज को मौजूदा पीढ़ी के हीरोज़ में वरुण ही बेहतर संभाल सकते हैं और संभाल भी रहे हैं। ऐसी फिल्मों में हीरोइनों का मुख्य काम हीरो के साथ डांस-रोमांस करते हुए छोटे कपड़े पहन कर दर्शकों की आंखों को गर्माने का चांस देना होता है और तापसी पन्नू जैक्लिन फर्नांडीज़ ने यह जिम्मा बखूबी निभाया है। सहयोगी भूमिकाओं में आए तमाम कलाकार भी उम्दा सहयोग दे गए। गाने फिल्म के मिजाज के मुताबिक चटपटे-मसालेदार हैं। हां, सलमान की एंट्री निराशाजनक रही।

इस किस्म की फिल्मों को देखते हुए दिमाग के तंतुओं को ज़ोर नहीं लगाना पड़ता। दिमाग को आराम देना हो, बेदिमाग चीजों को देख कर मिरगी आती हो और मसालेदार मनोरंजन से परहेज हो तो इसे देखने चले जाइए तीन से छह, छह से नौ या फिर नौ से बारह...!
अपनी रेटिंग-तीन स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपनी वेबसाइट सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)