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Friday, 25 December 2020

रिव्यू-एंटरटेमैंट का बोझ नहीं उठा पाई ‘कुली नं. 1’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पहला सीन-गोआ के एक रईस ईसाई बिज़नेसमैन जैफ्री रोज़ारियो की बेटी के लिए एक हिन्दू पंडित
रिश्ता लेकर आया हुआ है। (आप चाहें तो सिर्फ इस बेतुके सीन को देखने के बाद ही इस फिल्म को बंद करके किचन में पत्नी की या होमवर्क में बच्चों की मदद करने जैसा कोई सार्थक काम कर सकते हैं। इस रिव्यू को भी आगे न पढ़ने का फैसला आप यहीं
, इसी वक्त ले सकते हैं। नहीं...? चलिए, आपकी मर्ज़ी, हमें क्या, पढ़िए...) हां, तो जैफ्री उस पंडित की बेइज़्ज़ती करता है और पंडित मुंबई सैंट्रल रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने वाले राजू को महा-रईस बता कर उसका रिश्ता जैफ्री की बेटी से करवा देता है। ज़ाहिर है इस कहानी में कई उलझने होंगी जो अंत तक सुलझ ही जाएंगी।

Friday, 1 June 2018

रिव्यू-‘चरमसुख’ नहीं दे पाती ‘वीरे दी वेडिंग’

-दीपक दुआ...  (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
वीरे दी वेडिंग’-लगता है या तो वीर नाम के किसी पंजाबी लड़के की शादी होगी या किसी के वीर’ (पंजाबी में भाई) की। लेकिन यहां एक लड़की की शादी है और उसकी तीन सहेलियां इस शादी के लिए आई हुई हैं। ये चारों लड़कियां पुरानी दोस्त हैं, चड्डी-बड्डी, ब्रा-ब्रो टाइप की। ये एक-दूसरे को वीरे (भाई, ब्रो) कहती हैं।

इन चारों में से एक वकील है। तलाक-स्पेशलिस्ट, जो अपनी मां के कहने पर शादी के लिए लड़के देख रही है। दूसरी अपने पिता की मर्जी के खिलाफ किसी गोरे से शादी करके विलायत में रह रही है और एक बच्चे की मां है। तीसरी की शादी में उसके पिता ने साढ़े तीन करोड़ रुपए खर्च कर दिए पर वह छह महीने में ही अपने पति को छोड़ कर वापस गई। चौथी, जिसकी शादी है, वो सिर्फ अपने लवर की खुशी के लिए शादी कर रही है।