1999 में
हुई कारगिल
की लड़ाई
में भारत
ने क्या
खोया, क्या
पाया और
किस कीमत
पर पाया,
यह हम सब जानते
हैं। उस
युद्ध में
जान लड़ाने
और जान
गंवाने वाले
वीरों की
कहानियों को
सिनेमा में
भी दिखाया
गया जिनमें
से एक
‘एल.ओ.सी.
कारगिल’ ही
अब तक
सबसे प्रभावी
कही जा
सकती है।
करण जौहर
के बैनर
से अमेज़न
प्राइम पर
आई यह
फिल्म ‘शेरशाह’
भी उससे
ऊपर नहीं
उठ पाई
है। दरअसल
वॉर-हीरोज़
की कहानियों
का एक
तय ढर्रा
बना दिया
गया है।
उनका बचपन,
रोमांस, सेना
में जाने
की ललक
और सेना
में रह
कर दिखाए
गए शौर्य
के इर्द-गिर्द
ही ये
कहानियां घूमती
हैं। यह
फिल्म भी
वैसी ही
है।
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Thursday, 12 August 2021
Thursday, 8 April 2021
रिव्यू-मनोरंजन का सन्नाटा है ‘साइलेंस’ में
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
ट्रैकिंग के लिए गए चार लड़कों
को एक लड़की की लाश मिलती है। लड़की जस्टिस चौधरी की बेटी है। चौधरी के कहने पर ए.सी.पी.
अविनाश को इस केस में लगाया जाता है। अविनाश और उसकी टीम के लोग काफी छानबीन करके एक
दिन केस क्लोज़ कर ही देते हैं। लेकिन, केस क्लोज़ होने और केस सॉल्व होने में फर्क होता है, है न...?
Friday, 25 December 2020
रिव्यू-एंटरटेमैंट का बोझ नहीं उठा पाई ‘कुली नं. 1’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पहला सीन-गोआ के एक रईस ईसाई बिज़नेसमैन जैफ्री रोज़ारियो की बेटी के लिए एक हिन्दू
पंडित
रिश्ता लेकर आया हुआ है। (आप चाहें तो सिर्फ इस बेतुके सीन को देखने के बाद ही इस फिल्म को बंद करके किचन में पत्नी की या होमवर्क में बच्चों की मदद करने जैसा कोई सार्थक काम कर सकते हैं। इस रिव्यू को भी आगे न पढ़ने का फैसला आप यहीं, इसी वक्त ले सकते हैं। नहीं...? चलिए, आपकी मर्ज़ी, हमें क्या, पढ़िए...) हां, तो जैफ्री उस पंडित की बेइज़्ज़ती करता है और पंडित मुंबई सैंट्रल रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने वाले राजू को महा-रईस बता कर उसका रिश्ता जैफ्री की बेटी से करवा देता है। ज़ाहिर है इस कहानी में कई उलझने होंगी जो अंत तक सुलझ ही जाएंगी।
रिश्ता लेकर आया हुआ है। (आप चाहें तो सिर्फ इस बेतुके सीन को देखने के बाद ही इस फिल्म को बंद करके किचन में पत्नी की या होमवर्क में बच्चों की मदद करने जैसा कोई सार्थक काम कर सकते हैं। इस रिव्यू को भी आगे न पढ़ने का फैसला आप यहीं, इसी वक्त ले सकते हैं। नहीं...? चलिए, आपकी मर्ज़ी, हमें क्या, पढ़िए...) हां, तो जैफ्री उस पंडित की बेइज़्ज़ती करता है और पंडित मुंबई सैंट्रल रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने वाले राजू को महा-रईस बता कर उसका रिश्ता जैफ्री की बेटी से करवा देता है। ज़ाहिर है इस कहानी में कई उलझने होंगी जो अंत तक सुलझ ही जाएंगी।
Saturday, 25 July 2020
रिव्यू--हल्की-फुल्की सी, ठंडी कुल्फी सी ‘दिल बेचारा’
झारखंड का शहर जमशेदपुर। किज़ी बासु नाम की लड़की। कैंसर है उसे। हर जगह ऑक्सीज़न का सिलैंडर उठाए फिरती है। उदास रहती है। कब्रिस्तान में जाकर अनजान मृतकों के रिश्तेदारों के गले लग कर उन्हें सांत्वना देती है। इसी शहर में रहता है मैनी यानी इमैन्युअल राजकुमार जूनियर। इसे भी कैंसर है। एक टांग नकली है फिर भी बेहद ज़िंदादिल, खुशमिज़ाज, मसखरा किस्म का लड़का है। ये दोनों मिलते हैं। मैनी किज़ी से फ्लर्ट करता है। किज़ी धीरे-धीरे उसे अपने करीब आने देती है। इनमें प्यार भी हो जाता है मगर एक दिन...!Friday, 21 September 2018
रिव्यू-इस ‘मंटो’ को समझने के लिए उस मंटो को समझना होगा
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
‘अगर आप मेरे अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते... तो इसका मतलब यह है कि ज़माना ही नाकाबिले बर्दाश्त है...।’
‘अगर आप मेरे अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते... तो इसका मतलब यह है कि ज़माना ही नाकाबिले बर्दाश्त है...।’
इतनी बेबाकी, ठसक और शिद्दत के साथ सआदत हसन मंटो नाम के जिस शख्स ने उम्र भर अपनी बात कही,
वह उम्र भर किस संघर्ष से होकर गुजरता रहा और अपने आखिरी दौर में वह किस कदर मजबूर था,
यह भला कौन जानता है?
और अगर इन संघर्षों और मजबूरियों से उसका साबका न हुआ होता तो क्या यह मुमकिन नहीं कि वह सिर्फ 42 की उम्र में दुनिया न छोड़ता...?
Friday, 16 June 2017
रिव्यू-दिल चुराने में नाकाम ‘बैंक चोर’
-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
एक बैंक में चोरी करने तीन चोर पहुंचे हैं। तीनों दिमाग से पैदल हैं और बेहद बेवकूफाना हरकतें करते हैं। लेकिन इससे पहले कि वे कुछ कर पाएं, वहां पुलिस और सी.बी.आई. वाले भी पहुंच जाते हैं। अब खुलने शुरू होते हैं कुछ राज़ और कहानी में आने लगते हैं नए-नए ट्विस्ट।
एक काॅमेडी फिल्म के तौर पर शुरू होकर बहुत जल्द थ्रिलर बन जाने वाली इस फिल्म से मुझे सचमुच बहुत उम्मीदें थीं। लग रहा था कि काफी दिनों से सूखे पड़े बाजार और नीरस मन को यह फिल्म तर कर देगी। लेकिन अफसोस, कि ऐसा नहीं हो पाया। फिल्म में काॅमेडी है लेकिन वह आप को ठहाके नहीं लगवा पाती। थ्रिल है लेकिन वह आपको चौंकाता कम और उलझाता ज्यादा है। वैसे भी इस किस्म की कहानी में वह नहीं होता जो आप देखना चाहते हैं, बल्कि वह होता है जो लेखक-निर्देशक आपको दिखाना चाहते हैं।
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