प्रियदर्शन जैसे काबिल निर्देशक, यूनुस सजावल जैसे हिट लेखक, वीनस जैसा बड़ा बैनर, मलयालम की एक सफल फिल्म का रीमेक, ऊपर से ‘हंगामा’ का ब्रांड-सब चंगा ही तो है। अब इस पर ‘हंगामा 2’ नाम से कोई फिल्म बनेगी तो वह भी चंगी ही होगी,
लोगों का खूब मनोरंजन करेगी,
लोग उस तरह से हंसते-हंसते पागल भी हो सकते हैं जैसे प्रियन सर की ही ‘हेरा फेरी’,
‘भागम भाग’, ‘हंगामा’,
‘हलचल’, ‘चुप चुप के’,
‘दे दना दन’ वगैरह के समय हुए थे। लेकिन क्या सचमुच ऐसा हुआ...? ऐसा है...? ऐसा होगा...? जवाब है-नहीं, नहीं, नहीं...!
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Monday, 26 July 2021
रिव्यू-‘हंगामा 2’ में है कचरा अनलिमिटेड
Friday, 25 December 2020
रिव्यू-एंटरटेमैंट का बोझ नहीं उठा पाई ‘कुली नं. 1’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पहला सीन-गोआ के एक रईस ईसाई बिज़नेसमैन जैफ्री रोज़ारियो की बेटी के लिए एक हिन्दू
पंडित
रिश्ता लेकर आया हुआ है। (आप चाहें तो सिर्फ इस बेतुके सीन को देखने के बाद ही इस फिल्म को बंद करके किचन में पत्नी की या होमवर्क में बच्चों की मदद करने जैसा कोई सार्थक काम कर सकते हैं। इस रिव्यू को भी आगे न पढ़ने का फैसला आप यहीं, इसी वक्त ले सकते हैं। नहीं...? चलिए, आपकी मर्ज़ी, हमें क्या, पढ़िए...) हां, तो जैफ्री उस पंडित की बेइज़्ज़ती करता है और पंडित मुंबई सैंट्रल रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने वाले राजू को महा-रईस बता कर उसका रिश्ता जैफ्री की बेटी से करवा देता है। ज़ाहिर है इस कहानी में कई उलझने होंगी जो अंत तक सुलझ ही जाएंगी।
रिश्ता लेकर आया हुआ है। (आप चाहें तो सिर्फ इस बेतुके सीन को देखने के बाद ही इस फिल्म को बंद करके किचन में पत्नी की या होमवर्क में बच्चों की मदद करने जैसा कोई सार्थक काम कर सकते हैं। इस रिव्यू को भी आगे न पढ़ने का फैसला आप यहीं, इसी वक्त ले सकते हैं। नहीं...? चलिए, आपकी मर्ज़ी, हमें क्या, पढ़िए...) हां, तो जैफ्री उस पंडित की बेइज़्ज़ती करता है और पंडित मुंबई सैंट्रल रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने वाले राजू को महा-रईस बता कर उसका रिश्ता जैफ्री की बेटी से करवा देता है। ज़ाहिर है इस कहानी में कई उलझने होंगी जो अंत तक सुलझ ही जाएंगी।
Friday, 20 October 2017
रिव्यू-‘गोलमाल’ है भई सब झोलझाल है...
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
‘गोलमाल’ जैसी फिल्में बनाई ही इसलिए जाती हैं ताकि आपको ‘सब कुछ’
(जी हां,
सब कुछ) भुला कर मसालेदार,
चटपटा मनोरंजन परोसा जा
सके जिसमें भले ही दिमागहीन बाते हों लेकिन जिन्हें देख-सुन कर आप हंसे और कुछ पल के
लिए ही सही, उन नॉनसेंस चीजों को भी एन्जॉय करें। इस फ़ॉर्मूले को रोहित अपनी कॉमेडी फिल्मों
में परोसते आए हैं और हर बार सफल भी रहे हैं। यह फिल्म भी इस काम में कामयाब रही है।
काफी सारे सीन और संवाद ऐसे हैं जो आपको हंसाते हैं। हालांकि इसकी ढाई घंटे की लंबाई
कई जगह बेवजह खिंचती हुई भी लगती है लेकिन जब सामने मसालों की बौछार हो तो किसे फर्क
पड़ता है।
ऐसी फिल्मों में एक्टिंग की गहराई या निर्देशन की संजीदगी की बात भी नहीं की जाती।
हां, कुछ सरप्राइज एलिमेंट जरूर हैं जो अच्छे लगते हैं। रही म्यूजिक की बात,
तो ऐसी फिल्मों में गाने
इसलिए होते हैं ताकि उस दौरान आप बाहर जाकर खुद हल्के हो लें और पॉपकॉर्न-बर्गर वगैरह
पर अपनी जेब हल्की कर आएं।
सबसे पहले कहानी की बात। हंसिए मत, ‘गोलमाल’
जैसी फिल्मों में भी कहानी
होती है। भले ही वह कितनी ही महीन, बारीक,
पतली,
हल्की,
कमजोर,
बेकार या ऊल-जलूल क्यों
न हो। तो, इस कहानी में ‘गोलमाल’ वाले सारे कैरेक्टर ऊटी के एक
अनाथाश्रम में पले-बढ़े हैं। उस अनाथाश्रम के सेठ जी को मारने के बाद वहां की जमीन को
कोई हड़पना चाहता है और ये लोग मिल कर उस विलेन से लड़ते हैं। इस काम में ये एक भूतनी
की और वह भूतनी इनकी मदद करती है। उधर एक लाइब्रेरियन है जिसे भूत दिखाई देते हैं।
क्यों? और इन सबको भी वह भूतनी दिखती है, किसी और को नहीं। क्यों?
ये लोग आए तो उस भूतनी
की मदद करने हैं, लेकिन देखा जाए तो वह भूतनी ही
अपने-आप सब कुछ सुलटा लेती है। क्यों? और अगर भूतनी ने ही सब कुछ करना
था तो वह इन पर निर्भर ही क्यों थी? ऐसे ढेर सारे ‘क्यों’
आपके मन में आ सकते हैं।
पर जिस फिल्म को बनाने वालों ने उसके पोस्टर पर ही ‘लॉजिक नहीं सिर्फ मैजिक’
लिख दिया हो,
उसे देखते हुए ऐसे सवाल
मन में लाना इल्लॉजिकल है, गुनाह है,
गुनाह-ए-अजीम है।
‘गोलमाल’ जैसी फिल्में बनाई ही इसलिए जाती हैं ताकि आपको ‘सब कुछ’
(जी हां,
सब कुछ) भुला कर मसालेदार,
चटपटा मनोरंजन परोसा जा
सके जिसमें भले ही दिमागहीन बाते हों लेकिन जिन्हें देख-सुन कर आप हंसे और कुछ पल के
लिए ही सही, उन नॉनसेंस चीजों को भी एन्जॉय करें। इस फ़ॉर्मूले को रोहित अपनी कॉमेडी फिल्मों
में परोसते आए हैं और हर बार सफल भी रहे हैं। यह फिल्म भी इस काम में कामयाब रही है।
काफी सारे सीन और संवाद ऐसे हैं जो आपको हंसाते हैं। हालांकि इसकी ढाई घंटे की लंबाई
कई जगह बेवजह खिंचती हुई भी लगती है लेकिन जब सामने मसालों की बौछार हो तो किसे फर्क
पड़ता है।
ऐसी फिल्मों में एक्टिंग की गहराई या निर्देशन की संजीदगी की बात भी नहीं की जाती।
हां, कुछ सरप्राइज एलिमेंट जरूर हैं जो अच्छे लगते हैं। रही म्यूजिक की बात,
तो ऐसी फिल्मों में गाने
इसलिए होते हैं ताकि उस दौरान आप बाहर जाकर खुद हल्के हो लें और पॉपकॉर्न-बर्गर वगैरह
पर अपनी जेब हल्की कर आएं।
‘गोलमाल’ सीरिज की फिल्में असल में तीखे-चटपटे मसालों का झोलझाल होती हैं। इन्हें बिना दिमाग
को कष्ट दिए देखना चाहिए। यह हुनर और हिम्मत आपके पास हो तो इस फिल्म को जरूर देखिए,
दोस्तों के साथ,
फैमिली के साथ।
अपनी रेटिंग-ढाई स्टार
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