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Friday, 25 December 2020

रिव्यू-एंटरटेमैंट का बोझ नहीं उठा पाई ‘कुली नं. 1’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पहला सीन-गोआ के एक रईस ईसाई बिज़नेसमैन जैफ्री रोज़ारियो की बेटी के लिए एक हिन्दू पंडित
रिश्ता लेकर आया हुआ है। (आप चाहें तो सिर्फ इस बेतुके सीन को देखने के बाद ही इस फिल्म को बंद करके किचन में पत्नी की या होमवर्क में बच्चों की मदद करने जैसा कोई सार्थक काम कर सकते हैं। इस रिव्यू को भी आगे न पढ़ने का फैसला आप यहीं
, इसी वक्त ले सकते हैं। नहीं...? चलिए, आपकी मर्ज़ी, हमें क्या, पढ़िए...) हां, तो जैफ्री उस पंडित की बेइज़्ज़ती करता है और पंडित मुंबई सैंट्रल रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने वाले राजू को महा-रईस बता कर उसका रिश्ता जैफ्री की बेटी से करवा देता है। ज़ाहिर है इस कहानी में कई उलझने होंगी जो अंत तक सुलझ ही जाएंगी।

Friday, 24 January 2020

रिव्यू-मकसद में कामयाब ‘स्ट्रीट डांसर 3डी’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
सबसे पहले तो यह जान लीजिए कि अगर डिज़्नी पिक्चर्स वाले भारत से अपना बिस्तरा उठा कर नहीं भागते तो इस फिल्म का नाम एबीसीडी 3’ होना था। एबीसीडीसीरिज़ की पिछली दो फिल्मों जैसी ही कहानी, वही कलाकार, वही मुकाबले, वही डांस... तो फिर नया क्या है? नया है लंदन शहर, नया है कहानी में आने वाला एक ट्विस्ट। क्या...? आइए, जानते हैं।

Sunday, 21 April 2019

रिव्यू-सिनेमा की हीरा मंडी में जन्मी एक नाजायज़ फिल्म-'कलंक'

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
प्यार, नफरत, गुस्सा, घृणा, त्याग, ममता, हास्य, वगैरह-वगैरह जैसी बहुत सारी फीलिंग्स किसी कहानी को पढ़ते-देखते समय हमारे मन में उपजती है। पर क्या आप यकीन करेंगे कि 'कलंक' देखते समय किसी किस्म का कोई भाव ही नहीं उपजता। इस कदर भावशून्य कहानी है कि फ़िल्म शुरू होने के बाद फ़िल्म से, खुद से, ज़िंदगी से भरोसा उठने लगता है। मन होता है कि थिएटर में सो जाएं, या बेहतर होगा कि ऐसी फ़िल्म देखने से तो अच्छा है, मर ही जाएं...!

Saturday, 29 September 2018

रिव्यू-‘सुई धागा’ में सब बढ़िया है

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
दिल्ली से सटा यू.पी. का कोई कस्बा। एक बिल्कुल ही आम परिवार। अभावों से जूझता। रहने को ढंग की जगह, सुविधाएं, जेब भर पैसा, कायदे का काम। फिर भी सब बढ़िया है। बीवी ममता के कहने पर मौजी भैया नौकरी छोड़ कर लग गए अपना ही कुछकरने। ढेरों अड़चनें आईं। कुछ अपनों ने साथ छोड़ा तो कुछ परायों ने हाथ बंटाया। लेकिन हिम्मत हारी दोनों ने और जुटे रहे। अंत में तो इन्हें जीतना ही हुआ।

अभावग्रस्त और बिल्कुल नीचे से उठ कर कुछ बड़ा हासिल करने की अंडरडॉगकिस्म की कहानियां दर्शकों को हमेशा से लुभाती रही हैं। लेकिन यह कहानी सिर्फ मौजी और ममता की ही नहीं है। उनकी हिम्मत, संघर्ष, मेहनत से कुछ बड़ा हासिल करने की ही नहीं है। बल्कि यह अपने भीतर और भी बहुत कुछ ऐसा समेटे हुए है जिसके बारे में मुख्यधारा का सिनेमा आमतौर पर बात नहीं करता है। या कहें कि बॉक्स-ऑफिस के समीकरण उसे ऐसा करने से रोकते हैं।

Sunday, 15 April 2018

रिव्यू-उम्मीदों का मौसम ‘अक्टूबर’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में ट्रेनिंग कर रहे युवाओं में से एक लड़की शिउली तीसरी मंजिल से गिर कर कोमा में चली जाती है। गिरने से ठीक पहले उसने बस यूं ही उसी ग्रुप के साथी डैन (दानिश) के बारे में पूछा था कि वो कहां है? डैन को जब यह पता चलता है तो वह अपने कैरियर और यहां तक कि खुद को भी भुला कर अपना सारा समय अस्पताल में शिउली और उसके परिवार के साथ बिताने लगता है।

बड़ी ही साधारण-सी कहानी है। ग्रुप में किसी के साथ हादसा हो तो बाकी दोस्तों पर असर तो पड़ता ही है। लोग दो-चार बार अस्पताल जाते हैं, हमदर्दी जताते हैं और फिर अपने काम-धंधे में लग जाते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो खुद को उस हादसे से, उस इंसान से, उसके परिवार वालों से जोड़ लेते हैं। जो तो खुद उम्मीद छोड़ते हैं और ही दूसरों को छोड़ने देते हैं। डैन ऐसा ही लड़का है। हालांकि वह अक्खड़ है, नाराज़-सा रहता है, कोई भी काम सलीके से नहीं करता और इसी वजह से लगातार डांट भी खाता है। लेकिन शिउली के साथ हुआ हादसा और शिउली की हालत देख कर वह बदलने लगता है। दूसरों की परवाह तक करने वाला शख्स अब मैच्योर होने लगता है।

शुरू में काफी देर तक यह स्पष्ट नहीं होता कि फिल्म क्या कहना चाह रही है। इसकी धीमी रफ्तार आपको खिजाने लगती है। लेकिन धीरे-धीरे यह आपको स्पर्श करती है, सहलाती है और हौले से आपके भीतर समाने लगती है। फिल्म का अंत आपको चौंकाता नहीं है, ज्यादा भावुक भी नहीं करता। बस, अहसास दिलाता है कि कुछ है जो अभी दिलों में जिंदा है। कुछ है, जिसके दम पर आप खुद को इंसानों में गिन सकते हैं।

जूही चतुर्वेदी पहले भी अपनी कलम से हमें प्रभावित करती रही हैं। लेकिन इस बार उन्होंने जिस सहजता से, बिना कोई उतावलापन दिखाए कहानी को अपनी रौ में बहने दिया है, वह उन्हें एक अलग ही मकाम पर ले जाता है। संवादों में जान-बूझ कर वजन भरने या भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करने से बचते हुए उन्हें किरदारों के माकूल रहने दिया गया है। बतौर निर्देशक शुजित सरकार अपनी रेंज से लगातार चौंका रहे हैं। विकी डोनर’, ‘मद्रास कैफे’, ‘पीकूसे एकदम जुदा उनकी यह फिल्म उनकी पहली फिल्म यहांजैसी मिठास देती है। लेकिन यह उससे भी अलग है। हर फिल्म को पिछली वाली से अलग और बेहतर बनाने की उनकी काबिलियत सलामी की हकदार है।

वरुण धवन बदलापुरके बाद एक बार फिर जताते हैं कि वह छिछोरेपन से हट कर भी किरदार कर सकते हैं। शिउली बनी बनिता संधू अपनी पहली ही फिल्म में जम कर प्रभाव छोड़ती हैं। उन्हें आंखों से बातें कहना आता है। शिउली की मां के रोल में गीतांजलि राव अहसास दिलाती हैं कि किरदार में कैसे समाया जाता है। उन्हें लगातार पर्दे पर आते रहना चाहिए। फिल्म के बीच में कोई गाना नहीं है। इसकी जरूरत भी नहीं थी। अंत में आने वाले मनवा रुआंसा...में सुनिधि चौहान एक बार फिर चरम छूती नजर आती हैं। शांतनु मोइत्रा का संगीत फिल्म की रूह को छूता है।

फिल्म का नाम अक्टूबरक्यों है? इस नाम का नायिका शिउली के नाम से क्या नाता है? यह फिल्म सब बताती है। लेकिन इसके लिए आपको सब्र से इसे देखना होगा। तेज रफ्तार और तीखे मसालों के आदी हो चुके लोगों के लिए इसे जज़्ब करना मुश्किल होगा।

अक्टूबरजैसी फिल्में उम्मीदें जगाती हैं-सिनेमा के लिए और अपने आसपास की जिंदगी के लिए भी। मन होता है कि डैन जैसे इंसान और भी हों तो यह दुनिया कुछ ज्यादा सुहानी हो जाए।
अपनी रेटिंग-साढ़े तीन स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)