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Saturday, 26 June 2021

रिव्यू-अच्छी ‘रे’ सच्ची ‘रे’ पक्की ‘रे’ कच्ची ‘रे’

-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
.टी.टी. पर इधर एक अच्छी चीज़ उभर कर आई है जिसका नाम है-एंथोलॉजी। यानी लगभग एक ही जैसे विषय पर कही गईं अलग-अलग कहानियों को एक जगह दिखाना। खासतौर से नेटफ्लिक्स पर ऐसी कहानियां काफी रही हैं। इधर आईरेभी एक एंथोलॉजी है जिसमें महान फिल्मकार सत्यजित रे की लिखी चार कहानियों पर बनी चार फिल्में हैं। रे सिर्फ फिल्मकार ही नहीं, लेखक, गीतकार, संगीतकार, चित्रकार, पत्रकार और भी जाने क्या-क्या थे। इन चारों कहानियों की खासियत यह है कि इनके केंद्र में मुख्यतः पुरुष पात्र हैं जिनकी सोच, मनोदशा, आदतों, बातों आदि के ज़रिए ये कहानियां कुछ कहती हैं। क्या कहती हैं, आइए देखें।
 

Monday, 14 June 2021

ओल्ड रिव्यू-‘अंकुर अरोड़ा मर्डर केस’-सीरियस है मगर बोर नहीं

डॉक्टरी सिर्फ एक पेशा ही नहीं बिजनेस भी है...विक्रम भट्ट के बैनर से आई इस फिल्म में डॉक्टर अस्थाना बने के.के. मैनन का यह संवाद सिर्फ इस फिल्म की बल्कि दुनिया के सबसे पवित्र माने जाने वाले डॉक्टरी के पेशे की सच्चाई को भी सामने लाता है। अस्पतालों में इंसानी लापरवाही से किसी मरीज की मौत होना कोई नई और अनोखी बात नहीं है। अक्सर ऐसे मामले अदालतों तक भी पहुंचते हैं लेकिन आमतौर पर हो कुछ नहीं पाता। लेकिन इस फिल्म में सच की जीत होती है और गुनहगार को सज़ा भी मिलती है।
 

Friday, 11 June 2021

रिव्यू-खोखली फिल्म है ‘शादीस्थान’

मुंबई से अजमेर एक शादी में जा रहे परिवार की फ्लाइट छूट गई तो मजबूरन उन्हें एक म्यूज़िक बैंड के साथ उनकी बस में जाना पड़ा। यह परिवार अपनी इकलौती 18 बरस की लड़की की जबरन शादी करने पर तुला है जबकि लड़की राज़ी नहीं है। उधर इस बैंड की लड़की आज़ाद ख्याल है, सिगरेट-शराब पीती है, अपनी मर्ज़ी से जीती है। वह लड़की की मां को समझाती है कि इतनी जल्दी क्या है बेटी को खूंटे से बांधने की। मां-बाप आखिर मान भी जाते हैं, लेकिन कैसे?
 

Wednesday, 25 March 2020

वेब-रिव्यू : रोमांच की पूरी खुराक ‘स्पेशल ऑप्स’ में

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
13 दिसंबर, 2001-पांच आतंकवादियों ने भारत की संसद पर हमला किया और जवाबी कार्रवाई में मारे गए। लेकिन हमारी खुफिया एजेंसी रॉ के अफसर हिम्मत सिंह की तफ्तीश कहती है कि वहां पर कोई छठा आदमी भी था जो सिर्फ इनका मददगार था बल्कि इनका लीडर भी था। 18 बरस बीत चुके हैं और हिम्मत सिंह आज भी उस शख्स को तलाश रहा है। इस बीच उसने मध्य-पूर्व के कई देशों में अपने एजेंट फिट किए हैं। हिम्मत पर एन्क्वायरी बैठी हुई है कि पिछले कुछ साल में उसने 27 करोड़ रुपए कहां खर्च किए। उधर बहुत जल्द दिल्ली में एक बड़ा हमला होने वाला है। हिम्मत और उसकी टीम सारी घटनाओं के तार जोड़ रही है। क्या कामयाबी मिल पाएगी इन्हें?