13 दिसंबर, 2001-पांच आतंकवादियों ने भारत की संसद पर हमला किया और जवाबी कार्रवाई में मारे गए। लेकिन हमारी खुफिया एजेंसी रॉ के अफसर हिम्मत सिंह की तफ्तीश कहती है कि वहां पर कोई छठा आदमी भी था जो न सिर्फ इनका मददगार था बल्कि इनका लीडर भी था। 18 बरस बीत चुके हैं और हिम्मत सिंह आज भी उस शख्स को तलाश रहा है। इस बीच उसने मध्य-पूर्व के कई देशों में अपने एजेंट फिट किए हैं। हिम्मत पर एन्क्वायरी बैठी हुई है कि पिछले कुछ साल में उसने 27 करोड़ रुपए कहां खर्च किए। उधर बहुत जल्द दिल्ली में एक बड़ा हमला होने वाला है। हिम्मत और उसकी टीम सारी घटनाओं के तार जोड़ रही है। क्या कामयाबी मिल पाएगी इन्हें?
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Wednesday, 25 March 2020
वेब-रिव्यू : रोमांच की पूरी खुराक ‘स्पेशल ऑप्स’ में
13 दिसंबर, 2001-पांच आतंकवादियों ने भारत की संसद पर हमला किया और जवाबी कार्रवाई में मारे गए। लेकिन हमारी खुफिया एजेंसी रॉ के अफसर हिम्मत सिंह की तफ्तीश कहती है कि वहां पर कोई छठा आदमी भी था जो न सिर्फ इनका मददगार था बल्कि इनका लीडर भी था। 18 बरस बीत चुके हैं और हिम्मत सिंह आज भी उस शख्स को तलाश रहा है। इस बीच उसने मध्य-पूर्व के कई देशों में अपने एजेंट फिट किए हैं। हिम्मत पर एन्क्वायरी बैठी हुई है कि पिछले कुछ साल में उसने 27 करोड़ रुपए कहां खर्च किए। उधर बहुत जल्द दिल्ली में एक बड़ा हमला होने वाला है। हिम्मत और उसकी टीम सारी घटनाओं के तार जोड़ रही है। क्या कामयाबी मिल पाएगी इन्हें?Saturday, 17 February 2018
रिव्यू-बिना तैयारी कैसी ‘अय्यारी’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पिछले दिनों जिस किसी के भी सामने इस फिल्म का जिक्र हुआ तो यह सवाल सबसे पहले पूछा गया। यानी आप बिना आगे कुछ पढ़े यह समझ लीजिए कि कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो अपने नाम से ही पिटने लगती हैं। ‘अय्यारी’ उन्हीं में से एक है।
Saturday, 1 April 2017
रिव्यू-नाम शबाना, बस दिमाग मत लगाना
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
किसी फिल्म में किसी खास किरदार को देखते हुए अक्सर जेहन में यह सवाल आता है कि यह किरदार कहां से आया होगा... कैसी होगी इसकी पिछली जिंदगी... आज यह जैसा है, वैसा यह क्यों है... वगैरह-वगैरह। नीरज पांडेय की फिल्मों में ‘ए वैडनसडे’ के नसीरुद्दीन शाह, ‘स्पेशल 26’ के राजेश शर्मा, जिमी शेरगिल, ‘बेबी’ के अनुपम खेर, तापसी पन्नू, राणा डग्गूबाटी आदि के किरदारों के बारे में ये फिल्में कुछ नहीं बतातीं। ऐसे ही किरदारों की बैक-स्टोरी इन फिल्मों के पूर्व-भाग यानी प्रीक्वेल तैयार करवा सकती हैं। और चूंकि इन सबमें से ‘बेबी’ में जरा देर के लिए आई सीक्रेट एजेंट शबाना खान (तापसी पन्नू) की पिछली जिंदगी के बारे में जानने की उत्सुकता सबसे ज्यादा हो सकती है, तो उस पर यह फिल्म बना दी गई है। लेकिन क्या ‘बेबी’ का यह प्रीक्वेल भी उतना ही शानदार और कसा हुआ है? अफसोस भरा जवाब है-बिल्कुल नहीं।
किसी फिल्म में किसी खास किरदार को देखते हुए अक्सर जेहन में यह सवाल आता है कि यह किरदार कहां से आया होगा... कैसी होगी इसकी पिछली जिंदगी... आज यह जैसा है, वैसा यह क्यों है... वगैरह-वगैरह। नीरज पांडेय की फिल्मों में ‘ए वैडनसडे’ के नसीरुद्दीन शाह, ‘स्पेशल 26’ के राजेश शर्मा, जिमी शेरगिल, ‘बेबी’ के अनुपम खेर, तापसी पन्नू, राणा डग्गूबाटी आदि के किरदारों के बारे में ये फिल्में कुछ नहीं बतातीं। ऐसे ही किरदारों की बैक-स्टोरी इन फिल्मों के पूर्व-भाग यानी प्रीक्वेल तैयार करवा सकती हैं। और चूंकि इन सबमें से ‘बेबी’ में जरा देर के लिए आई सीक्रेट एजेंट शबाना खान (तापसी पन्नू) की पिछली जिंदगी के बारे में जानने की उत्सुकता सबसे ज्यादा हो सकती है, तो उस पर यह फिल्म बना दी गई है। लेकिन क्या ‘बेबी’ का यह प्रीक्वेल भी उतना ही शानदार और कसा हुआ है? अफसोस भरा जवाब है-बिल्कुल नहीं। Friday, 30 September 2016
रिव्यू-क्यों देखने लायक है धोनी की यह कहानी...?
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
सिनेमा और क्रिकेट-इस देश के लोगों में इन दोनों के ही
प्रति जबर्दस्त दीवानगी है। ऐसे में अगर भारतीय क्रिकेट के स्टार खिलाड़ी महेंद्र सिंह
धोनी की जिंदगी पर कोई फिल्म बन कर आए तो लोगों में उसके प्रति हद दर्जे की उत्सुकता
होना स्वाभाविक है। इस फिल्म को देखते हुए यह उत्सुकता भले ही पूरी तरह से शांत न होती
हो, मगर यह फिल्म धोनी से जुड़ी हर वह चीज आपको परोसने की कोशिश करती है,
जो जरूरी है। यह बात अलग
है कि यह बड़ी ही चतुराई से कई चीज़ें छुपा भी जाती है।
पान सिंह धोनी के घर में एक बेटे के पैदा होने से लेकर
उसके एक नामी क्रिकेटर बनने और वनडे इंटरनेशनल में वर्ल्ड कप जीतने तक के इस सफर में
ज्यादातर बातें वही हैं जो धोनी के दीवानों को पता होंगी। लेकिन फिल्म डाॅक्यूमैंट्री
या जीवनी न होने का दावा करती हुई भी उन तमाम बातों को सिलेसिलेवार दिखाती है।
शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि पर्दे पर किसी हिन्दी फिल्म
के दो नाम ‘एम एस धोनी-द अनटोल्ड स्टोरी’ और ‘एम एस धोनी-एक अनकही कहानी’
दिखाई देते हैं। दूसरे
वाले नाम से सस्पैंस या हॉरर की महक आती है, मुमकिन है इसीलिए पहले वाला नाम
रखा गया हो। लेकिन यहीं गड़बड़ हुई है। धोनी के प्रसंशक पूछ सकते हैं कि इसमें ‘अनटोल्ड’
या ‘अनकहा’
क्या था?
मगर यह फिल्म इसका जवाब
देती है और भरपूर देती है।
किसी भी खिलाड़ी के महान बनने के पीछे,
घर-घर और दिल-दिल में राज
करने के पीछे उसका खुद का एक लंबा और तकलीफ भरा संघर्ष तो रहता ही है,
उसके घरवालों,
दोस्तों,
करीबियों की भी उसमें महती
भूमिका रहती है और यह फिल्म उनकी इस भूमिका को न सिर्फ कायदे से समझती और समझाती है
बल्कि बताती है कि कोई भी सिर्फ खुद के दम पर महान नहीं हो सकता। धोनी के मामले में
उसके पिता का उसके सुरक्षित भविष्य को लेकर लगातार चिंतित रहना,
उसकी बहन,
उसके दोस्तों,
साथी खिलाड़ियों,
कोच,
उसे रेलवे में नौकरी देने
वाले अफसर, उसके सहकर्मी जैसे ढेरों किरदारों की सोच और नीयत के बारे में खुल कर दिखाती है
यह फिल्म।
निर्देशक नीरज पांडेय किरदारों के मन में झांकते
हुए सीन-दर-सीन कहानी बुनने का हुनर बखूबी जानते हैं। सुशांत सिंह राजपूत ने धोनी के
किरदार को न सिर्फ निभाया है, बल्कि जिया है। अपनी हर अदा से
वह इस किरदार को सशक्त बनाते हुए नजर आते हैं। अनुपम खेर,
राजेश शर्मा,
कुमुद मिश्रा जैसे कलाकार
उन्हें भरपूर सहयोग देते हैं। दोनों नायिकाओं की मौजूदगी प्यारी लगती है। भूमिका चावला
को बहन-भाभी के ऐसे किरदारों को करते रहना चाहिए। गीत-संगीत काफी साधारण है। चंद जोरदार
गाने होते तो यह फिल्म और गहरा असर छोड़ती। हां, बैकग्राउंड म्यूजिक असरदार है
और वह फिल्म को ज्यादा प्रभावी बनाने में मदद करता है। लोकेशंस भी स्क्रिप्ट की जरूरत
के मुताबिक चुनी गईं और रांची क्षेत्र की भाषा भी।
लेकिन यह फिल्म कमियों से भी अछूती नहीं है। इसे देखते
हुए साफ लगता है कि इसे धोनी के प्रचार और उनके सिर्फ उजले पक्ष को दिखाने के लिए ही
बनाया गया है। उनका शांत स्वभाव, कम बोलना,
विनम्रता, मोटर-साइकिलों के प्रति
दीवानगी जैसे ढेरों पहलुओं को दिखाने के फेर में यह 3 घंटे 10 मिनट की हो गई जो सचमुच
बहुत ज्यादा हैं। स्क्रिप्ट में कुछ एक झोल और थोड़ी-बहुत लड़खड़ाहट के अलावा कुछ चीजों
का जबरन ठूंसा जाना भी इसे हल्का बनाता है।
फिर भी यह फिल्म बहुत कुछ देती है। क्रिकेट और धोनी के
चाहने वालों के अलावा क्रिकेट से दूर रहने वाले मुझ जैसे आम दर्शकों के लिए भी इसमें
बहुत कुछ है। खासतौर से यह मैसेज कि मेहनत और किस्मत के अलावा एक और भी चीज है जो आपको
आपकी मंजिल तक ले जाती है और वह है सही समय पर लिया गया सही फैसला।
माही को अगर मैदान जीतने आते हैं तो उन पर बनी यह फिल्म भी
बॉक्स-ऑफिस जीतने जा रही है। इसे मिस मत कीजिएगा। वैसे भी पूरे परिवार के साथ बैठ कर
देखा जाने वाला सिनेमा अब अपने यहां कम ही बनता है।
अपनी रेटिंग-चार स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com)
के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य हैं और रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)
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