नेत्रा पाटिल को जाना है स्विट्जरलैंड लेकिन उसकी किस्मत में लिखी है एक सरकारी दफ्तर की क्लर्की। ए.सी.पी. सौम्या शुक्ला खुद को समझती है जेम्स बॉण्ड लेकिन डिपार्टमैंट ने उसे बना रखा है आइटम गर्ल। दोनों के सपने जुदा, दुनिया जुदा, ज़िंदगी जुदा, ज़िंदगी जीने का ढंग जुदा। एक जगह ये दोनों मिलती हैं और फिर साथ चलने लगती हैं। दरअसल नेत्रा मरने वाली है। उसके पास सिर्फ हंड्रेड डेज़ (सौ दिन) हैं। इस दौरान वह वो सब कुछ कर लेना चाहती है,
जो उसने अभी तक नहीं किया। उसे अपनी बची हुई ज़िंदगी में एक्साइटमैंट चाहिए और यह एक्साइटमैंट उसे देती है ‘सौम्या मईडम’ अपनी मुखबिर बना कर।
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Saturday, 4 July 2020
वेब-रिव्यू : अच्छा, टाइम-पास एंटरटेनमैंट देती ‘हंड्रेड’
नेत्रा पाटिल को जाना है स्विट्जरलैंड लेकिन उसकी किस्मत में लिखी है एक सरकारी दफ्तर की क्लर्की। ए.सी.पी. सौम्या शुक्ला खुद को समझती है जेम्स बॉण्ड लेकिन डिपार्टमैंट ने उसे बना रखा है आइटम गर्ल। दोनों के सपने जुदा, दुनिया जुदा, ज़िंदगी जुदा, ज़िंदगी जीने का ढंग जुदा। एक जगह ये दोनों मिलती हैं और फिर साथ चलने लगती हैं। दरअसल नेत्रा मरने वाली है। उसके पास सिर्फ हंड्रेड डेज़ (सौ दिन) हैं। इस दौरान वह वो सब कुछ कर लेना चाहती है,
जो उसने अभी तक नहीं किया। उसे अपनी बची हुई ज़िंदगी में एक्साइटमैंट चाहिए और यह एक्साइटमैंट उसे देती है ‘सौम्या मईडम’ अपनी मुखबिर बना कर।Wednesday, 25 March 2020
वेब-रिव्यू : रोमांच की पूरी खुराक ‘स्पेशल ऑप्स’ में
13 दिसंबर, 2001-पांच आतंकवादियों ने भारत की संसद पर हमला किया और जवाबी कार्रवाई में मारे गए। लेकिन हमारी खुफिया एजेंसी रॉ के अफसर हिम्मत सिंह की तफ्तीश कहती है कि वहां पर कोई छठा आदमी भी था जो न सिर्फ इनका मददगार था बल्कि इनका लीडर भी था। 18 बरस बीत चुके हैं और हिम्मत सिंह आज भी उस शख्स को तलाश रहा है। इस बीच उसने मध्य-पूर्व के कई देशों में अपने एजेंट फिट किए हैं। हिम्मत पर एन्क्वायरी बैठी हुई है कि पिछले कुछ साल में उसने 27 करोड़ रुपए कहां खर्च किए। उधर बहुत जल्द दिल्ली में एक बड़ा हमला होने वाला है। हिम्मत और उसकी टीम सारी घटनाओं के तार जोड़ रही है। क्या कामयाबी मिल पाएगी इन्हें?Saturday, 8 September 2018
रिव्यू-कचरा लव-स्टोरी है ‘लैला मजनू’
दो परिवार। दोनों में अदावत। दोनों के बच्चे आपस में प्यार कर बैठे। घरवालों ने
उन्हें जुदा कर दिया तो दोनों ने एक-दूसरे के लिए तड़पते हुए जान दे दी। यही तो कहानी
थी ‘लैला मजनू’ की। इसी कहानी पर बरसों
से फिल्में बनती रहीं। कामयाब भी होती रहीं। क्यों...? क्योंकि उनमें मोहब्बत की वो तासीर थी कि दिल सायं-सायं करता था। भावनाओं के वो
दरिया थे जो हमारी आंखों से बहते थे। इश्क का वो रूहानी अहसास था जो सिर्फ महसूस किया
जा सकता है, बयान नहीं। लेकिन अफसोस, इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो आपको छू तक सके।
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