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Saturday, 22 August 2020

रिव्यू-तंग सोच को ठेंगा दिखाती ‘मी रक़्सम’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
भरतनाट्यम-भारत का डांस। हमाराअपनाडांस। लेकिन अगर कोईपरायाभी इसे करना चाहे तो हम उसे रोकते नहीं हैं। ऐसी ही एकपराईलड़की मरियम और उसके पिता के संघर्षों की कहानी है यह। मां की असमय मौत के बाद किशोरी मरियम का मन हुआ कि वह भरतनाट्यम सीखे। पिता सलीम ने रोका नहीं, उलटे साथ दिया। लेकिन आड़े गए तंग सोच वाले वे लोग जिन्होंने समाज की हर बात का ठेका ले रखा है। हाशिम सेठ के इशारे पर सलीम को उसकेअपनोंने ही दुत्कारना शुरू कर दिया। उधर जयप्रकाश जैसे लोग भी भला कहां खुश थे एकपराईलड़की को यह डांस करते देख कर।

Thursday, 20 August 2020

अच्छे सिनेमा की मिसाल होगी ‘मी रक़्सम’-राकेश चतुर्वेदी

-दीपक दुआ...
दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से प्रशिक्षित प्रसिद्ध अभिनेता-निर्देशक राकेश चतुर्वेदी रंगमंच के अलावा फिल्मों में भी भरपूर सक्रिय रहते हैं। बतौर निर्देशक वह नसीरुद्दीन शाह को लेकरबोलो रामऔर मनोज पाहवा के साथभल्ला एट हल्ला डॉट कॉमनिर्देशित कर चुके हैं। बतौर अभिनेतापरज़ानिया, ‘यूं होता तो क्या होता, ‘पैडमैनआदि के बाद अक्षय कुमार कीकेसरीमें मुल्ला सैदुल्लाह के किरदार से काफी चर्चित हुए राकेश अब मशहूर सिनेमैटोग्राफर बाबा आज़मी के निर्देशन में बनी पहली फिल्ममी रक़्सममें दिखेंगे जो कि .टी.टी. प्लेटफॉर्म ज़ी-5 पर रही है। प्रस्तुत है उनसे हुई चंद बातें-

Friday, 6 March 2020

किस्से सुनाते और दिखाते हैं राकेश चतुर्वेदी

-दीपक दुआ...
थिएटर यानी रंगमंच मूलतः कहानियां कहने का ही मंच हैं जहां पर कलाकार खुद को विभिन्न कहानियों के किरदारों में बदल कर अपने अभिनय से मंचित करते हैं। लेकिन रंगमंच भी अपने भीतर कई तरह की विधाएं समेटे है। इन्हीं में से एक है किसी अकेले कलाकार द्वारा मंच पर कहानियों को भावों और भंगिमाओं द्वारा सुनाना या दिखाना। आम भाषा में इसे किस्सागोई कह सकते हैं। लेकिन देखा जाए तो यह किस्सागोई की प्रचलित परंपरा से भी अलग है। क्या है यह और कैसे होता है कहानियों का मंचन। आइए जानते हैं दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक, प्रसिद्ध अभिनेता-निर्देशक राकेश चतुर्वेदी से जो अधिकतर सआदत हसन मंटो की कहानियों को रंगमंच पर सुनाते हैं। पिछले वर्ष आई अक्षय कुमार की फिल्म ‘केसरी’ में मुल्ला सैदुल्लाह के किरदार से काफी चर्चित हुए राकेश नसीरुद्दीन शाह को लेकर बोलो रामऔर मनोज पाहवा के साथ भल्ला एट हल्ला डॉट कॉमनिर्देशित कर चुके हैं। अब राकेश अपनी तीसरी फिल्म मंडलीलाने की तैयारियों में व्यस्त हैं। लेकिन अपने पहले प्यार यानी थिएटर पर वह लगातार सक्रिय रहते हैं।

Thursday, 21 March 2019

रिव्यू-निश्चय कर जीतने की कहानी कहती ‘केसरी’

-दीपक दुआ...  (Featured in IMDb Critic Reviews)
सारागढ़ी के किले में जब ब्रिटिश फौज के 21 सिक्ख सिपाहियों को दस हज़ार से ज़्यादा अफगान कबायलियों ने घेर लिया तो उन्होंने झुकने या भागने की बजाय लड़ने का रास्ता चुना। लड़े भी तो, अंग्रेज़ी फौज के लिए, किले के लिए, अपने लिए बल्कि दुनिया को यह बताने के लिए कि हम भले ही गुलाम जिए लेकिन मरे तो आज़ाद मरे, अपनी मर्ज़ी से मरे, वीरों की मौत मरे।

Wednesday, 20 March 2019

‘केसरी’ फिल्म का ‘चल झूठा’ यानी राकेश चतुर्वेदी

-दीपक दुआ...
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से अभिनय का पाठ पढ़ कर मुंबई पहुंचे अभिनेता राकेश चतुर्वेदी रंगमंच पर काम करने के अलावा बतौर निर्देशक दो फिल्में-बोलो रामऔर भल्ला एट हल्ला डॉट कॉम’ बना चुके हैं। साथ ही साथ वह बड़े पर्दे पर बतौर अभिनेता भी सक्रिय रहते हैं। पिछले साल वह अक्षय कुमार की पैडमैनमें उस प्रोफेसर के किरदार में आए थे जिनके घर में अक्षय काम करते हैं। अब राकेश अक्षय के साथ केसरीमें रहे हैं। उनसे हुई बातचीत-
-‘केसरीऔर इसमें अपने रोल के बारे में बताएं?
-यह सारागढ़ी की उस लड़ाई की कहानी है जिसमें ब्रिटिश सेना की सिक्ख रेजिमेंट की एक बटालियन के सिर्फ 21 सिपाहियों ने दस हजार अफगानी कबायलियों से टक्कर ली थी और उन्हें धूल चटा दी थी। अक्षय कुमार इस फिल्म में हवलदार ईशर सिंह के रोल में हैं और मेरा रोल एक अफगानी मौलवी का है जो इस सारे घटनाक्रम का एक बहुत ही अहम किरदार है। यह किरदार इतिहास में भी था जिसे डायरेक्टर अनुराग सिंह ने बहुत ही खूबसूरती के साथ फिल्म में दिखाया है। इस समय इससे ज्यादा कुछ कहना सही नहीं होगा। आप इस फिल्म के ट्रेलर में भी मुझे देख सकते हैं जब मेरे एक संवाद पर अक्षय सर मुझे चल झूठाकहते हैं। 'केसरी' का रिव्यू यहाँ पढ़ें...