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Monday, 24 August 2020

रिव्यू-जीना और जीतना सिखाती है ‘गुंजन सक्सेना’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक छोटी बच्ची ने पायलट बनने का सपना देखा। पिता ने हर कदम उसका साथ दिया। पायलट नहीं बन पाई तो उसे एयरफोर्स में जाने को कहा। लेकिन क्या हर कदम पर दुनिया उस लड़की का स्वागत ही करेगी? अपने समाज की तो आदत ही रही है लड़कियों के पंख कतरने की। लेकिन गुंजन लड़ी, लड़ी तो जीती, जीती तो ऐसे कि मिसाल बन गई।

Friday, 20 September 2019

रिव्यू-एंटरटेनमैंट की पिच पर चला ट्रैक्टर-‘द ज़ोया फैक्टर’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
25 जून, 1983-इंडियन टीम ने क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता और ठीक उसी दिन सोलंकी परिवार में एक लड़की ज़ोया जन्मी। क्रिकेट के दीवाने पिता ने उसे लकी-चार्म मान लिया। बड़ी होकर काम के सिलसिले में यह लड़की इंडियन क्रिकेटर्स से मिली और हारती हुई टीम जीतने लगी। सबने मान लिया कि ज़ोया का लक-फैक्टर ही टीम को जिता रहा है। पर क्या सचमुच ऐसा है...?

कहानी दिलचस्प है, हट कर है, और शायद इसीलिए 2008 में आया अनुजा चौहान का लिखा अंग्रेज़ी उपन्यास ज़ोया फैक्टर’ (अंग्रेज़ीदां पाठकों ने) काफी पसंद किया था। बरसों तक विज्ञापनों की दुनिया में काम करने और क्रिकेटर्स के अजीबोगरीब अंधविश्वासों को करीब से देखने वाली अनुजा ने इस उपन्यास में यह सवाल उठाया था कि क्या महज़ किसी एक शख्स के लक-फैक्टर से टीम इंडिया की परफॉर्मेंस बदली जा सकती है? साथ ही हर चमत्कार को नमस्कार करने की आम लोगों की प्रवृत्ति को भी उन्होंने कटघरे में खड़ा किया था। पर क्या यह ज़रूरी है कि किसी बेस्टसेलर उपन्यास पर बनी फिल्म भी उतनी ही उम्दा और बेस्ट हो...?

Friday, 13 July 2018

रिव्यू-डट कर नहीं खेला ‘सूरमा’

-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
संदीप सिंह-भारतीय हॉकी का सितारा। दुनिया का सबसे तेज ड्रैग-फ्लिकर। अचानक एक गोली चली और वो व्हील-चेयर का मोहताज हो गया। लेकिन बंदे ने हिम्मत नहीं हारी। अपने जीवट से वो सिर्फ दोबारा खड़ा हुआ, दौड़ा, खेला, बल्कि इंडियन टीम का कप्तान भी बना।

है दमदार कहानी? भला कौन प्रेरित नहीं होगा इस कहानी से। ऐसी कहानियों पर फिल्में बननी ही चाहिएं ताकि लोगों को प्रेरणा मिले, हारे हुओं को हौसला मिले। जीतने की ताकत देती हैं ऐसी कहानियां। पर क्या सिर्फ यह कहानी कह देना भर ही काफी होगा? ऐसा ही होता तो इस पर फिल्म की क्या ज़रूरत थी?

सिनेमा की अपनी एक अलग भाषा होती है। किसी कहानी को पर्दे पर उतारने से पहले कागज़ पर उसकी तामीर होती है, उसके बाद वो कैमरे की नज़र से देखी-दिखाई जाती है। बतौर निर्देशक शाद अली अपने गुरु मणिरत्नम के साथ रह कर इतना तो जानते ही हैं कि यह सारी कसरतें कैसे की जाती हैं। लेकिन उनकी पिछली दो फिल्में (किल दिल, ओके जानू) बताती हैं कि उनके भीतर उतनी गहरी समझ और नज़र नहीं है कि वो किसी कहानी के तल में गोता मार कर मोती चुन लाएं।

संदीप सिंह की कहानी को फिल्मी पटकथा में तब्दील करते हुए लेखकों को वही पुराना घिसा-पिटा आइडिया ही सूझा कि संदीप ने एक लड़की के लिए हॉकी खेलनी शुरू की और लड़की के दूर चले जाने पर ही उसके अंदर की आग तेज हुई। फिल्म है तो काफी कुछ फिल्मीहोना लाजिमी है। लेकिन जब असली कंटेंट ही हल्का पड़ने लगे, फिल्म कहीं बेवजह खिंचने लगे, कभी झोल खाने लगे, कुछ नया कहने की बजाय सपाट हो जाए, जिसे देखते हुए मुट्ठियां भिंचें, धड़कनें तेज हों और एक प्रेरक कहानी दिल में उतरने की बजाय बस छू कर निकल जाए तो लगता है कि चूक हुई है और भारी चूक हुई है। इसी कहानी को कोई महारथी डायरेक्टर मिला होता तो यह पर्दा फाड़ कर जेहन पर काबिज हो सकती थी। काश, कि यह फिल्म अपने नाम के मुताबिक तगड़ी होती।

संदीप के किरदार में दिलजीत दोसांझ असरदार रहे हैं। हालांकि शुरूआत के सीक्वेंस में वह किरदार से ज्यादा बड़े लगे हैं। तापसी पन्नू का सहयोग उम्दा रहा। संदीप के बड़े भाई के रोल में अंगद बेदी का काम ज़बर्दस्त रहा। विजय राज जब-जब दिखे, कमाल लगे। सतीश कौशिक और कुलभूषण खरबंदा भी जंचे। गुलज़ार के गीत और शंकर-अहसान-लॉय का संगीत अच्छा होने के बावजूद गहरा असर छोड़ पाने में नाकाम रहा। इश्क दी बाजियां...के बोल प्यारे हैं। लोकेशन, कैमरा सटीक रहे। लेकिन सिक्ख परिवार की कहानी दिखाती फिल्म में पंजाबी शब्दों की बजाय बेवजह आए हिन्दी शब्द अखरते हैं।
अपनी रेटिंग-ढाई स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)