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Friday, 12 June 2020

रिव्यू-नमक नींबू की कमी से नीरस होती ‘गुलाबो सिताबो’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
लखनऊ की एक बहुत पुरानी हवेली फातिमा महल। एकदम खंडहर। उसकी उतनी ही पुरानी मालकिन-95 बरस की फातिमा बेगम। उनका 78 बरस का शौहर मिर्ज़ा-एकदम खड़ूस, कंजूस, नाकारा और सनकी। इस हवेली में रहते पांच किराएदारों के परिवार। ये मिर्ज़ा से परेशान, मिर्ज़ा इनसे परेशान। इनमें से ही एक है बांके जिसके साथ मिर्ज़ा की हरदम तू-तू-मैं-मैं लगी रहती है। मिर्ज़ा इस हवेली को बेगम से हड़पना चाहता है तो वहीं किराएदार चाहते हैं कि उन्हें भी कुछ मिल जाए। इस पकड़म-पकड़ाई में कभी मिर्ज़ा आगे तो कभी बांके एंड पार्टी।

Tuesday, 21 April 2020

ओल्ड रिव्यू-अनछुए विषय पर स्वस्थ मनोरंजन ‘विकी डोनर’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
किसी संवेदनशील विषय को कैसे उठाया जाता है इसे निर्देशक शुजित सरकार करीब सात साल पहले आई अपनी पिछली और पहली फिल्म यहांमें दिखा चुके हैं। कश्मीर के हालात की पृष्ठभूमि में एक आतंकवादी की बहन और एक फौजी अफसर की प्रेम कहानी दिखाने के बाद अपनी इस फिल्म में शुजित स्पर्म डोनेशन जैसे अनछुए विषय की पृष्ठभूमि में एक पंजाबी लड़के और एक बंगाली लड़की की लव स्टोरी लेकर आए हैं।

Saturday, 22 February 2020

रिव्यू-शुभ मंगल ज़्यादा मज़ेदार

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
बंद कमरे में अमन अपने माता-पिता को बताता है कि वह गे’ (समलैंगिक) है और कार्तिक से प्यार करता है। मां कहती है-तू चिंता मत कर, हम तेरा इलाज करवाएंगे और तू बिल्कुल ठीक हो जाएगा।अमन कहता है-वाह मम्मी, आपका ऑक्सीटोसिन प्यार और मेरा बीमारी...!

यही तो होता है हमारे समाज में कि जिस किसी ने भी समाज की रिवायतों के बंधे-बंधाए ढर्रे से हट कर चलना चाहा उसे बीमारमान लिया गया जबकि सच यह है कि इंसान समलैंगिक बनता नहीं है, होता है। ठीक वैसे, जैसे यह फिल्म कहती है कि अमिताभ बच्चन बना नहीं जाता, वो तो होता है।

Friday, 13 September 2019

रिव्यू-किसी ‘सायर’ की ‘गज्जल’-ड्रीम गर्ल

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक लड़का है जो लड़की की आवाज़ निकाल सकता है। कोई और नौकरी नहीं मिलती तो एक फ्रेंडशिप कॉल सेंटर में पूजा बन कर लोगों का दिल बहलाता है और उनका बिल बढ़ाता है। पर उलझनें तब बढ़ती हैं जब उसके दीवाने उससे शादी करने और उसके लिए मरने-मारने पर उतर आते हैं। अब यह सच वह किसी को बता नहीं सकता कि कइयों की ड्रीमगर्ल यह पूजा असल में कोई दूजा है।

Thursday, 27 June 2019

रिव्यू-मुल्क का दलदल दिखाती ‘आर्टिकल 15’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
रंग दे बसंतीमें एयरफोर्स अफसर बने माधवन कहते हैं-तुम बदलो इस देश को। पॉलिटिक्स ज्वाइन करो, पुलिस या आई..एस. में भर्ती हो जाओ, बदलो चीज़ों को। लेकिन तुम नहीं करोगे। क्योंकि घर की सफाई में हाथ गंदे कौन करे...!

इस फिल्म को आए 13 बरस से ज़्यादा हो गए। इस दौरान कई बार मेरे ज़ेहन में यह ख्याल आया कि माधवन की इस सलाह को कितनों ने सुना होगा? सुना होगा तो क्या माना भी होगा? माना होता तो हर साल इस मुल्क की ऊंची और पॉवरफुल कुर्सियों पर बैठने वाले आई..एस., आई.पी.एस. अफसर हालात बदलने के लिए क्यों नहीं कुछ कर पा रहे? क्या ये भी ज़ंग लगे सिस्टम का हिस्सा होकर रह जाते हैं? और फिर मुझे आर्टिकल 15’ जैसी फिल्म दिखती है जो बताती है कि अभी इतना अंधेरा नहीं हुआ है कि कोई उम्मीद की किरण भी ढूंढ पाए। जो दिखाती है कि अयान रंजन नाम का एक आई.पी.एस. अफसर माधवन के कहे को मान कर इस गंदगी में उतरता है, अपने हाथ भी गंदे करता है और चीज़ों को बदलता भी है। उम्मीद की एक बड़ी चमक मुझे इस फिल्म का प्रैस शो देखने के अगले ही दिन अखबार में भी मिलती है कि कैसे विदिशा के कलेक्टर खुद नाले में सफाई करने उतर गए और बाकियों के लिए प्रेरणा बन गए। समाज और सिनेमा जब एकरूप होते हैं तभी तस्वीर मुकम्मल होती है।