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Sunday, 14 February 2021

रिव्यू-जीवन के रंग-बेरंग दिखाती ‘द लास्ट कलर’

-गति उपाध्याय... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक विधवा, एक अछूत और एक किन्नर के प्रति तरह-तरह के पूर्वाग्रहों से जकड़े समाज की क्रूरता पर बनी है यह फिल्म। कहानी में एक चौथी अघोषित नायिका भी है-इंस्पेक्टर राजा रघुवंशी की पत्नी, जो अन्याय का मौन प्रतिकार तो शुरू से करती है, अंत में उसका मुखर होना दर्शकों को अवाक कर देता है।
 
एक छोटी अछूत अनाथ बच्ची हर किसी को बचाती, हंसाती और स्कूल जाने के सपने के साथ बनारस के घाट पर दिखाई पड़ती है। उसका बचपन बचा लेने के लिए एक थर्ड जेंडर पुलिस वालों के शोषण का शिकार होता है, जबकि उसे नहीं पता कि वो कब तक उसे बचा पाएगा? समझ नहीं आता कि वो किन्नर शोषित है या कि शोषक पुलिस वाला।

Saturday, 22 February 2020

रिव्यू-शुभ मंगल ज़्यादा मज़ेदार

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
बंद कमरे में अमन अपने माता-पिता को बताता है कि वह गे’ (समलैंगिक) है और कार्तिक से प्यार करता है। मां कहती है-तू चिंता मत कर, हम तेरा इलाज करवाएंगे और तू बिल्कुल ठीक हो जाएगा।अमन कहता है-वाह मम्मी, आपका ऑक्सीटोसिन प्यार और मेरा बीमारी...!

यही तो होता है हमारे समाज में कि जिस किसी ने भी समाज की रिवायतों के बंधे-बंधाए ढर्रे से हट कर चलना चाहा उसे बीमारमान लिया गया जबकि सच यह है कि इंसान समलैंगिक बनता नहीं है, होता है। ठीक वैसे, जैसे यह फिल्म कहती है कि अमिताभ बच्चन बना नहीं जाता, वो तो होता है।

Saturday, 25 January 2020

रिव्यू-अरमानों से हल्का-सा ‘पंगा’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
कभी थी वो देश की कबड्डी टीम की कप्तान। आज उसके पास रेलवे की नौकरी है। पति भी रेलवे में इंजीनियर। एक प्यारा-सा बेटा। रेलवे का दिया घर। खुशहाल ज़िंदगी। क्या नहीं है उसके पास। लेकिन उसे तो ज़िंदगी से पंगा लेना है। बेटे के अरमान पूरे करने के लिए कबड्डी में वापस आई जया निगम को अब कबड्डी में अपनी भी खुशी दिखाई देने लगती है। लेकिन यह पंगा इतना आसान थोड़े ही है।

Thursday, 18 October 2018

रिव्यू-‘बधाई हो’, बढ़िया फिल्म हुई है...!

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
दिल्ली का मध्यवर्गीय खुशहाल परिवार। पिता रेलवे में, मां घर में। बड़ा बेटा नौकरी में, छोटा बारहवीं में। दादी खटिया पर। तभी पता चला कि घर में एक नन्हा मेहमान आने वाला है। मां, फिर से मां बनने वाली है। भूचाल गया जी। बेटों ने मां-बाप से मुंह मोड़ लिया, दादी ने बेटे-बहू से। परिवार, मौहल्ले, बिरादरी, समाज में छिछालेदार होने लगी, सो अलग। लेकिन अंत भला, तो सब भला।

Friday, 3 August 2018

रिव्यू-इस ‘मुल्क’ में इतनी भी गर्म हवा नहीं

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक ऐसा परिवार जिसने 1947 के बंटवारे के वक्त मज़हब और मुल्क में से मुल्क को चुना, उसकी देशभक्ति पर आप कैसे उंगली उठा सकते हैं...?

यह कैसा तर्क हुआ? इसका मतलब सन् 47 में पाकिस्तान जाने वाले सारे मुसलमान ज़बर्दस्त देशभक्त हैं तो फिर पाकिस्तान छोड़ कर आने वाले सारे हिन्दू देशद्रोही ही हुए? भई, वो भी तो अपने (हिन्दू) मज़हब के लिए अपना (पाकिस्तान) मुल्क छोड़ कर आए थे ...!