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Monday, 26 July 2021

रिव्यू-‘हंगामा 2’ में है कचरा अनलिमिटेड

प्रियदर्शन जैसे काबिल निर्देशक, यूनुस सजावल जैसे हिट लेखक, वीनस जैसा बड़ा बैनर, मलयालम की एक सफल फिल्म का रीमेक, ऊपर सेहंगामाका ब्रांड-सब चंगा ही तो है। अब इस परहंगामा 2’ नाम से कोई फिल्म बनेगी तो वह भी चंगी ही होगी, लोगों का खूब मनोरंजन करेगी, लोग उस तरह से हंसते-हंसते पागल भी हो सकते हैं जैसे प्रियन सर की हीहेरा फेरी, ‘भागम भाग, ‘हंगामा, ‘हलचल, ‘चुप चुप के, ‘दे दना दनवगैरह के समय हुए थे। लेकिन क्या सचमुच ऐसा हुआ...? ऐसा है...? ऐसा होगा...? जवाब है-नहीं, नहीं, नहीं...!
 

Thursday, 24 October 2019

रिव्यू-‘मेड इन चाइना’-चाईनीज़ शफाखाने का चिंदी चूरण

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
चीन से सरकारी दौरे पर गुजरात आया एक अफसर यहां का एक सूप पीकर मर जाता है। सी.बी.आई. के लोग सूप बेचने वाले डॉक्टर (बोमन ईरानी) और उसे बनाने वाले रघु (राजकुमार राव) तक पहुंचते हैं। आरोप लगता है कि इस सूप में चीन से मंगवाए गए बाघ के शरीर के हिस्से हैं। तब रघु उन्हें पूरी कहानी बताता है कि कैसे हर धंधे में नाकाम होने के बाद उसने इस मैजिक सूपका कारोबार शुरू किया जिससे मर्दों की पॉवर’ बढ़ती है। कैसे उसने इस काम में डॉक्टर और बाकी लोगों को जोड़ा। कैसे इन लोगों ने आम जनता में फैली भ्रांतियों को दूर करने का काम किया, वगैरह-वगैरह। पर क्या सचमुच इस सूप में कुछ आपत्तिजनक था? क्या सचमुच वह अफसर इस सूप की वजह से ही मरा? और क्या सच में यह सूप वायग्रा से कई गुना ज़्यादा ताकतवर है?

Friday, 24 May 2019

रिव्यू-भाता है वह ‘मोदी’ तो भाएगी यह ‘मोदी’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Review)
जिस फिल्म का नाम पी एम नरेंद्र मोदीहो और जिसमें करोड़ों लोगों के प्रिय (और करोड़ों के अप्रिय भी) नेता नरेंद्र मोदी की जीवन-यात्रा दिखाई गई हो तो दर्शक उसमें क्या देखना चाहेंगे? इस सवाल के दो जवाब हो सकते हैं। पहला यह कि मोदी-समर्थक इस फिल्म में मोदी की महिमा का मंडन और उनका प्रशस्ति-गान देखना चाहेंगे और दूसरा यह कि मोदी-विरोधी इसे... देखना ही क्यों चाहेंगे? तो कुल जमा निष्कर्ष यह कि जब यह फिल्म देखनी ही मोदी समर्थकों ने है तो इसमें ऐसा कुछ क्यों डालना जो मोदी-विरोधियों को खुश करे? और जब इसे मोदी-विरोधियों ने देखना ही नहीं है तो क्यों इसमें ऐसी चीज़ें भरपूर मात्रा में डाली जाएं जो मोदी-समर्थकों को रास आएं? और जब रास आने वाली चीज़ें ही डालनी हैं तो फिर क्या तो सिर, क्या पैर, क्या तो लॉजिक और क्या तथ्य!