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Friday, 2 August 2019

रिव्यू-बेअसर पुड़िया देता ‘ख़ानदानी शफ़ाखाना’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पंजाब के होशियार पुर में खानदानी शफाखाना यानी सैक्स क्लिनिकचलाने वाले हकीम ताराचंद (कुलभूषण खरबंदा) अपनी वसीयत में अपना यह दवाखाना अपनी भानजी बेबी बेदी (सोनाक्षी सिन्हा) के नाम कर गए-इस शर्त के साथ कि कम से कम छह महीने उसे यह क्लिनिक चलाना पड़ेगा, उसके बाद ही वह उसे बेच पाएगी। बेमन से बेबी ने यह काम शुरू किया। धीरे-धीरे उसका मन इसमें रमने लगा। लेकिन घर-परिवार, दुनिया वाले उसके खिलाफ हो गए। हाय रब्बा, लड़की होकर ऐसे वालाक्लिनिक चलाती है, सरेआम सैक्सकी बात करती है...! लेकिन बेबी ठहरी होशियार पुर की होशियार लड़की। उसने हार थोड़े ही माननी है...!

Saturday, 26 January 2019

रिव्यू-‘मणिकर्णिका’-वो तो झांसी वाली रानी थी

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
रानी लक्ष्मीबाई की वीरता के किस्सों ने रानी को सचमुच हमारे जेहन में किसी मनुज नहीं बल्कि अवतारी का दर्जा दिया हुआ है। ऐसी रानी की कहानी पर कोई फिल्म बन कर आए तो ज़ाहिर है कि उसमें इतिहास में बयान वे उजले पक्ष तो होंगे ही जिन्होंने उन्हें एक असाधारण वीरांगना का दर्जा दिया, साथ ही दंतकथाओं के उन हिस्सों का होना भी लाजिमी है जिन्होंने रानी को आज भी हमारे दिलों में जीवित रखा हुआ है। इस फिल्म में वो सब है जो आप देखना चाहते हैं। लेकिन साथ ही ऐसा भी बहुत कुछ है जो इसे बनाने वाले आपको दिखाना चाहते हैं। फिर चाहे वो इतिहास का हिस्सा हो या नहीं।

Friday, 13 July 2018

रिव्यू-डट कर नहीं खेला ‘सूरमा’

-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
संदीप सिंह-भारतीय हॉकी का सितारा। दुनिया का सबसे तेज ड्रैग-फ्लिकर। अचानक एक गोली चली और वो व्हील-चेयर का मोहताज हो गया। लेकिन बंदे ने हिम्मत नहीं हारी। अपने जीवट से वो सिर्फ दोबारा खड़ा हुआ, दौड़ा, खेला, बल्कि इंडियन टीम का कप्तान भी बना।

है दमदार कहानी? भला कौन प्रेरित नहीं होगा इस कहानी से। ऐसी कहानियों पर फिल्में बननी ही चाहिएं ताकि लोगों को प्रेरणा मिले, हारे हुओं को हौसला मिले। जीतने की ताकत देती हैं ऐसी कहानियां। पर क्या सिर्फ यह कहानी कह देना भर ही काफी होगा? ऐसा ही होता तो इस पर फिल्म की क्या ज़रूरत थी?

सिनेमा की अपनी एक अलग भाषा होती है। किसी कहानी को पर्दे पर उतारने से पहले कागज़ पर उसकी तामीर होती है, उसके बाद वो कैमरे की नज़र से देखी-दिखाई जाती है। बतौर निर्देशक शाद अली अपने गुरु मणिरत्नम के साथ रह कर इतना तो जानते ही हैं कि यह सारी कसरतें कैसे की जाती हैं। लेकिन उनकी पिछली दो फिल्में (किल दिल, ओके जानू) बताती हैं कि उनके भीतर उतनी गहरी समझ और नज़र नहीं है कि वो किसी कहानी के तल में गोता मार कर मोती चुन लाएं।

संदीप सिंह की कहानी को फिल्मी पटकथा में तब्दील करते हुए लेखकों को वही पुराना घिसा-पिटा आइडिया ही सूझा कि संदीप ने एक लड़की के लिए हॉकी खेलनी शुरू की और लड़की के दूर चले जाने पर ही उसके अंदर की आग तेज हुई। फिल्म है तो काफी कुछ फिल्मीहोना लाजिमी है। लेकिन जब असली कंटेंट ही हल्का पड़ने लगे, फिल्म कहीं बेवजह खिंचने लगे, कभी झोल खाने लगे, कुछ नया कहने की बजाय सपाट हो जाए, जिसे देखते हुए मुट्ठियां भिंचें, धड़कनें तेज हों और एक प्रेरक कहानी दिल में उतरने की बजाय बस छू कर निकल जाए तो लगता है कि चूक हुई है और भारी चूक हुई है। इसी कहानी को कोई महारथी डायरेक्टर मिला होता तो यह पर्दा फाड़ कर जेहन पर काबिज हो सकती थी। काश, कि यह फिल्म अपने नाम के मुताबिक तगड़ी होती।

संदीप के किरदार में दिलजीत दोसांझ असरदार रहे हैं। हालांकि शुरूआत के सीक्वेंस में वह किरदार से ज्यादा बड़े लगे हैं। तापसी पन्नू का सहयोग उम्दा रहा। संदीप के बड़े भाई के रोल में अंगद बेदी का काम ज़बर्दस्त रहा। विजय राज जब-जब दिखे, कमाल लगे। सतीश कौशिक और कुलभूषण खरबंदा भी जंचे। गुलज़ार के गीत और शंकर-अहसान-लॉय का संगीत अच्छा होने के बावजूद गहरा असर छोड़ पाने में नाकाम रहा। इश्क दी बाजियां...के बोल प्यारे हैं। लोकेशन, कैमरा सटीक रहे। लेकिन सिक्ख परिवार की कहानी दिखाती फिल्म में पंजाबी शब्दों की बजाय बेवजह आए हिन्दी शब्द अखरते हैं।
अपनी रेटिंग-ढाई स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)