उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुए हैं एक लाल बिहारी। एक दिन उन्हें पता चला कि उनके चाचा ने उनके हिस्से की पुश्तैनी ज़मीन हड़पने के लिए उन्हें कागज़ों में मृतक घोषित करवा दिया है। इसके बाद लाल बिहारी बरसों तक तमाम सरकारी दफ्तरों से लेकर कोर्ट-कचहरी तक चक्कर लगाते रहे कि उन्हें ज़िंदा घोषित किया जाए। कई बड़े लोगों के खिलाफ चुनाव तक में खड़े हुए और यू.पी. की विधान सभा में पर्चे तक उछाले। इस दौरान देश भर से उन जैसे ढेरों ‘मृतक’ लोग उनके साथ आ जुड़े और इन्होंने अपना एक ‘मृतक संघ’ तक बना लिया। बरसों के संघर्ष के बाद लाल बिहारी और कुछ अन्य लोगों को ‘ज़िंदा’ घोषित कर दिया गया लेकिन आज भी बीसियों जीवित लोग खुद को जीवित साबित करने की जद्दोज़हद में लगे हुए हैं।
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Monday, 11 January 2021
Thursday, 5 December 2019
रिव्यू-हैरान करती है ‘यह साली आशिकी’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
होटल मैनेजमैंट के कॉलेज में लड़का-लड़की मिलते हैं, उनमें दोस्ती होती है और फिर मोहब्बत। दर्शक के मन में सवाल उठता है कि एक रोमांटिक कहानी पर ‘यह साली आशिकी’ जैसा निगेटिव नाम क्यां? लेकिन जल्दी ही कहानी की परतें खुलने लगती हैं और पता चलता है कि जो दिख रहा है,
उसके पीछे की कहानी कुछ और है। इंटरवल आते-आते यह रोमांटिक से थ्रिलर फिल्म में तब्दील हो जाती है और इंटरवल के बाद एक रिवेंज ड्रामा। आखिर है क्या इसमें?
होटल मैनेजमैंट के कॉलेज में लड़का-लड़की मिलते हैं, उनमें दोस्ती होती है और फिर मोहब्बत। दर्शक के मन में सवाल उठता है कि एक रोमांटिक कहानी पर ‘यह साली आशिकी’ जैसा निगेटिव नाम क्यां? लेकिन जल्दी ही कहानी की परतें खुलने लगती हैं और पता चलता है कि जो दिख रहा है,
उसके पीछे की कहानी कुछ और है। इंटरवल आते-आते यह रोमांटिक से थ्रिलर फिल्म में तब्दील हो जाती है और इंटरवल के बाद एक रिवेंज ड्रामा। आखिर है क्या इसमें?Wednesday, 5 June 2019
रिव्यू-बुलंद ‘भारत’ की टाइमपास तस्वीर
ईद के मौके पर सलमान खान
की औसत किस्म की फिल्मों को उनके चाहने वाले इतना ज़्यादा चला देते हैं कि लगता है कि
न तो सलमान और न ही उन्हें लेकर फिल्म बनाने वाले औसत से ऊपर उठने की सोचते होंगे।
अब इसी फिल्म को लीजिए। कहने को इसमें एक दक्षिण कोरियाई फिल्म से कहानी लेकर उसे भारतीय
रंग-ढंग में ढाला गया है। लेकिन यह रंग-ढंग कई जगह इतना बेरंग और बेढंगा-सा हो जाता
है कि आप उकताने लगते हैं। यूं इसमें वो सब कुछ है जो सलमान की फिल्मों में होता है
और जो एक आम हिन्दी मसाला फिल्म में होना चाहिए,
लेकिन इस ‘सब कुछ’ में वो गहराई नहीं है जो आपको इसमें गोते लगाने को मजबूर कर
दे।
Thursday, 16 May 2019
रिव्यू-देखने लायक हरियाणवी फिल्म ‘छोरियां छोरों से कम नहीं होतीं’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Review)
‘दंगल’
के ताऊ आमिर खान ने पूछा था-‘म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के...?’
अब यह हरियाणवी फिल्म उसी के जवाब में कह रही है-‘छोरियां छोरों से कम नहीं होतीं।’ बता दूं कि 2016 में आई ‘सतरंगी’
के बाद अब जाकर कोई हरियाणवी फिल्म रिलीज़ हुई है। ज़ी स्टूडियो और सतीश कौशिक इसके निर्माता हैं और सतीश के असिस्टैंट रहे राजेश अमरलाल बब्बर इसके निर्देशक।
‘दंगल’
के ताऊ आमिर खान ने पूछा था-‘म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के...?’
अब यह हरियाणवी फिल्म उसी के जवाब में कह रही है-‘छोरियां छोरों से कम नहीं होतीं।’ बता दूं कि 2016 में आई ‘सतरंगी’
के बाद अब जाकर कोई हरियाणवी फिल्म रिलीज़ हुई है। ज़ी स्टूडियो और सतीश कौशिक इसके निर्माता हैं और सतीश के असिस्टैंट रहे राजेश अमरलाल बब्बर इसके निर्देशक।
कहानी इसकी साधारण-सी है। हरियाणा के एक गांव में छोरे की चाहत रखने वाले जयदेव चौधरी के घर में जब दूसरी भी छोरी आई तो वह निराश हो गया। लेकिन उसी दूसरी बेटी बिनीता ने हर मैदान में छोरों को मात दी और एक दिन आई.पी.एस. अफसर बन कर माता-पिता का सिर फख्र से ऊंचा कर दिया।
Friday, 13 July 2018
रिव्यू-डट कर नहीं खेला ‘सूरमा’
-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
संदीप सिंह-भारतीय हॉकी का सितारा। दुनिया का सबसे तेज ड्रैग-फ्लिकर। अचानक एक गोली चली और वो व्हील-चेयर का मोहताज हो गया। लेकिन बंदे ने हिम्मत नहीं हारी। अपने जीवट से वो न सिर्फ दोबारा खड़ा हुआ, दौड़ा,
खेला, बल्कि इंडियन टीम का कप्तान भी बना।
संदीप सिंह की कहानी को फिल्मी पटकथा में तब्दील करते हुए लेखकों को वही पुराना घिसा-पिटा आइडिया ही सूझा कि संदीप ने एक लड़की के लिए हॉकी खेलनी शुरू की और लड़की के दूर चले जाने पर ही उसके अंदर की आग तेज हुई। फिल्म है तो काफी कुछ ‘फिल्मी’
होना लाजिमी है। लेकिन जब असली कंटेंट ही हल्का पड़ने लगे, फिल्म
कहीं बेवजह खिंचने लगे, कभी
झोल खाने लगे, कुछ
नया कहने की बजाय सपाट हो जाए, जिसे
देखते हुए मुट्ठियां न भिंचें, धड़कनें
न तेज हों और एक प्रेरक कहानी दिल में उतरने की बजाय बस छू कर निकल जाए तो लगता है कि चूक हुई है और भारी चूक हुई है। इसी कहानी को कोई महारथी डायरेक्टर मिला होता तो यह पर्दा फाड़ कर जेहन पर काबिज हो सकती थी। काश, कि
यह फिल्म अपने नाम के मुताबिक तगड़ी होती।
संदीप सिंह-भारतीय हॉकी का सितारा। दुनिया का सबसे तेज ड्रैग-फ्लिकर। अचानक एक गोली चली और वो व्हील-चेयर का मोहताज हो गया। लेकिन बंदे ने हिम्मत नहीं हारी। अपने जीवट से वो न सिर्फ दोबारा खड़ा हुआ, दौड़ा,
खेला, बल्कि इंडियन टीम का कप्तान भी बना।
है न दमदार कहानी? भला
कौन प्रेरित नहीं होगा इस कहानी से। ऐसी कहानियों पर फिल्में बननी ही चाहिएं ताकि लोगों को प्रेरणा मिले, हारे
हुओं को हौसला मिले। जीतने की ताकत देती हैं ऐसी कहानियां। पर क्या सिर्फ यह कहानी कह देना भर ही काफी होगा? ऐसा
ही होता तो इस पर फिल्म की क्या ज़रूरत थी?
सिनेमा की अपनी एक अलग भाषा होती है। किसी कहानी को पर्दे पर उतारने से पहले कागज़ पर उसकी तामीर होती है, उसके
बाद वो कैमरे की नज़र से देखी-दिखाई जाती है। बतौर निर्देशक शाद अली अपने गुरु मणिरत्नम के साथ रह कर इतना तो जानते ही हैं कि यह सारी कसरतें कैसे की जाती हैं। लेकिन उनकी पिछली दो फिल्में (किल दिल, ओके
जानू) बताती हैं कि उनके भीतर उतनी गहरी समझ और नज़र नहीं है कि वो किसी कहानी के तल में गोता मार कर मोती चुन लाएं।
संदीप सिंह की कहानी को फिल्मी पटकथा में तब्दील करते हुए लेखकों को वही पुराना घिसा-पिटा आइडिया ही सूझा कि संदीप ने एक लड़की के लिए हॉकी खेलनी शुरू की और लड़की के दूर चले जाने पर ही उसके अंदर की आग तेज हुई। फिल्म है तो काफी कुछ ‘फिल्मी’
होना लाजिमी है। लेकिन जब असली कंटेंट ही हल्का पड़ने लगे, फिल्म
कहीं बेवजह खिंचने लगे, कभी
झोल खाने लगे, कुछ
नया कहने की बजाय सपाट हो जाए, जिसे
देखते हुए मुट्ठियां न भिंचें, धड़कनें
न तेज हों और एक प्रेरक कहानी दिल में उतरने की बजाय बस छू कर निकल जाए तो लगता है कि चूक हुई है और भारी चूक हुई है। इसी कहानी को कोई महारथी डायरेक्टर मिला होता तो यह पर्दा फाड़ कर जेहन पर काबिज हो सकती थी। काश, कि
यह फिल्म अपने नाम के मुताबिक तगड़ी होती।
संदीप के किरदार में दिलजीत दोसांझ असरदार रहे हैं। हालांकि शुरूआत के सीक्वेंस में वह किरदार से ज्यादा बड़े लगे हैं। तापसी पन्नू का सहयोग उम्दा रहा। संदीप के बड़े भाई के रोल में अंगद बेदी का काम ज़बर्दस्त रहा। विजय राज जब-जब दिखे, कमाल
लगे। सतीश कौशिक और कुलभूषण खरबंदा भी जंचे। गुलज़ार के गीत और शंकर-अहसान-लॉय का संगीत अच्छा होने के बावजूद गहरा असर छोड़ पाने में नाकाम रहा। ‘इश्क
दी बाजियां...’ के बोल प्यारे हैं। लोकेशन, कैमरा
सटीक रहे। लेकिन सिक्ख परिवार की कहानी दिखाती फिल्म में पंजाबी शब्दों की बजाय बेवजह आए हिन्दी शब्द अखरते हैं।
अपनी रेटिंग-ढाई स्टार
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