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Wednesday, 16 June 2021

ओल्ड रिव्यू-ज़मीनी सच्चाई दिखाती ‘उड़ता पंजाब’

-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
एक सीन देखिए-बिहार से आकर पंजाब के खेतों में काम कर रही मज़दूर (आलिया भट्ट) कहती है-‘हमने कभी बीड़ी नहीं पिया और पंजाब में इन लोगों ने हमको सुई (नशे) का आदत लगा दिया।इस पर नशा छोड़ कर सुधरने की कोशिश कर रहा रॉकस्टार टॉमी सिंह (शाहिद कपूर) सवाल करता है-‘तो फिर छोड़ क्यों नहीं देती?’ सवाल के बदले वह पूछती है-‘क्या, पंजाब या सुई?’ जवाब मिलता है-‘एक ही बात है...!’
 
यह इस फिल्म की कहानी का सच है जो बताता है कि कैसे देश के सबसे अमीर सूबों में गिने जाने वाले पंजाब के गबरू जवान नशे के शिकार होकर परिवार और समाज पर बोझ हुए जा रहे हैं। कैसे यह पांच दरियाओं की धरती नशे का पर्याय बन चुकी है। और यह भी कि अगर आपको नशा छोड़ना है तो आपको यह जगह छोड़नी होगी क्योंकि यहां तो हर जगह नशे का राज है।

Thursday, 26 December 2019

रिव्यू-मुबारक हो, ‘गुड न्यूज़’ है

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
वरुण बत्रा-दीप्ति बत्रा। पति-पत्नी। बरसों की कोशिश के बाद भी ये दोनों मां-बाप नहीं बन पा रहे थे तो ये लोग पहुंचे डॉ. जोशी के आई.वी.एफ. क्लिनिक में ताकि कृत्रिम गर्भाधान करवा सकें। लेकिन एक गड़बड़ हो गई। वहां चंडीगढ़ से हनी बत्रा-मोनिका बत्रा भी इसी काम से आए हुए थे और क्लिनिक वालों की गलती से वरुण बत्रा के स्पर्म मोनिका की कोख में और हनी बत्रा के दीप्ति की कोख में जा पहुंचे। अब क्या किया जाए?

Sunday, 28 July 2019

रिव्यू-अर्जुन ‘लिटल-लिटल’ पटियाला

-दीपक दुआ...(Featured in IMDb Critics Reviews)
इस फिल्म में पांच गाने हैं, हीरो-हीरोइन का रोमांस है, कॉमेडी है, पांच विलेन हैं (जो अंताक्षरी खेलने के लिए तो नहीं रखे गए हैं) यानी एक्शन भी है, इमोशन भी है, सोशल मैसेज भी है, और हां, सनी (पा जी नहीं) लियोनी भी है। अब एक हिन्दी फिल्म में आपको और क्या चाहिए?

Friday, 13 July 2018

रिव्यू-डट कर नहीं खेला ‘सूरमा’

-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
संदीप सिंह-भारतीय हॉकी का सितारा। दुनिया का सबसे तेज ड्रैग-फ्लिकर। अचानक एक गोली चली और वो व्हील-चेयर का मोहताज हो गया। लेकिन बंदे ने हिम्मत नहीं हारी। अपने जीवट से वो सिर्फ दोबारा खड़ा हुआ, दौड़ा, खेला, बल्कि इंडियन टीम का कप्तान भी बना।

है दमदार कहानी? भला कौन प्रेरित नहीं होगा इस कहानी से। ऐसी कहानियों पर फिल्में बननी ही चाहिएं ताकि लोगों को प्रेरणा मिले, हारे हुओं को हौसला मिले। जीतने की ताकत देती हैं ऐसी कहानियां। पर क्या सिर्फ यह कहानी कह देना भर ही काफी होगा? ऐसा ही होता तो इस पर फिल्म की क्या ज़रूरत थी?

सिनेमा की अपनी एक अलग भाषा होती है। किसी कहानी को पर्दे पर उतारने से पहले कागज़ पर उसकी तामीर होती है, उसके बाद वो कैमरे की नज़र से देखी-दिखाई जाती है। बतौर निर्देशक शाद अली अपने गुरु मणिरत्नम के साथ रह कर इतना तो जानते ही हैं कि यह सारी कसरतें कैसे की जाती हैं। लेकिन उनकी पिछली दो फिल्में (किल दिल, ओके जानू) बताती हैं कि उनके भीतर उतनी गहरी समझ और नज़र नहीं है कि वो किसी कहानी के तल में गोता मार कर मोती चुन लाएं।

संदीप सिंह की कहानी को फिल्मी पटकथा में तब्दील करते हुए लेखकों को वही पुराना घिसा-पिटा आइडिया ही सूझा कि संदीप ने एक लड़की के लिए हॉकी खेलनी शुरू की और लड़की के दूर चले जाने पर ही उसके अंदर की आग तेज हुई। फिल्म है तो काफी कुछ फिल्मीहोना लाजिमी है। लेकिन जब असली कंटेंट ही हल्का पड़ने लगे, फिल्म कहीं बेवजह खिंचने लगे, कभी झोल खाने लगे, कुछ नया कहने की बजाय सपाट हो जाए, जिसे देखते हुए मुट्ठियां भिंचें, धड़कनें तेज हों और एक प्रेरक कहानी दिल में उतरने की बजाय बस छू कर निकल जाए तो लगता है कि चूक हुई है और भारी चूक हुई है। इसी कहानी को कोई महारथी डायरेक्टर मिला होता तो यह पर्दा फाड़ कर जेहन पर काबिज हो सकती थी। काश, कि यह फिल्म अपने नाम के मुताबिक तगड़ी होती।

संदीप के किरदार में दिलजीत दोसांझ असरदार रहे हैं। हालांकि शुरूआत के सीक्वेंस में वह किरदार से ज्यादा बड़े लगे हैं। तापसी पन्नू का सहयोग उम्दा रहा। संदीप के बड़े भाई के रोल में अंगद बेदी का काम ज़बर्दस्त रहा। विजय राज जब-जब दिखे, कमाल लगे। सतीश कौशिक और कुलभूषण खरबंदा भी जंचे। गुलज़ार के गीत और शंकर-अहसान-लॉय का संगीत अच्छा होने के बावजूद गहरा असर छोड़ पाने में नाकाम रहा। इश्क दी बाजियां...के बोल प्यारे हैं। लोकेशन, कैमरा सटीक रहे। लेकिन सिक्ख परिवार की कहानी दिखाती फिल्म में पंजाबी शब्दों की बजाय बेवजह आए हिन्दी शब्द अखरते हैं।
अपनी रेटिंग-ढाई स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)