प्रियदर्शन जैसे काबिल निर्देशक, यूनुस सजावल जैसे हिट लेखक, वीनस जैसा बड़ा बैनर, मलयालम की एक सफल फिल्म का रीमेक, ऊपर से ‘हंगामा’ का ब्रांड-सब चंगा ही तो है। अब इस पर ‘हंगामा 2’ नाम से कोई फिल्म बनेगी तो वह भी चंगी ही होगी,
लोगों का खूब मनोरंजन करेगी,
लोग उस तरह से हंसते-हंसते पागल भी हो सकते हैं जैसे प्रियन सर की ही ‘हेरा फेरी’,
‘भागम भाग’, ‘हंगामा’,
‘हलचल’, ‘चुप चुप के’,
‘दे दना दन’ वगैरह के समय हुए थे। लेकिन क्या सचमुच ऐसा हुआ...? ऐसा है...? ऐसा होगा...? जवाब है-नहीं, नहीं, नहीं...!
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Monday, 26 July 2021
रिव्यू-‘हंगामा 2’ में है कचरा अनलिमिटेड
Tuesday, 30 March 2021
रिव्यू-थोड़ी हाई थोड़ी फ्लैट ‘पगलैट’
लखनऊ की संध्या
का पति आस्तिक
शादी के पांच
महीने में ही
मर गया। कल
ही उसकी अंत्येष्टि
हुई है। लेकिन
संध्या को न
तो रोना आ
रहा है और
भूख भी जम
कर लग रही
है। उसे चाय
नहीं पेप्सी पीनी
है, गोलगप्पे खाने है।
अगले 13 दिन तक
घर में जमा
किस्म-किस्म के
लोगों की सोच
और नज़रों से
निबटना है। कुछ
पुराने हिसाब चुकता
करने है। कुछ
नए फैसले लेने
है। कुछ चीज़ों
पर मिट्टी डालनी
है तो कुछ
नए बीज भी
बोने हैं।
Friday, 21 February 2020
रिव्यू-डराने में कामयाब है यह ‘भूत’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
मुंबई के जुहू बीच पर जाने कहां से एक पुराना जहाज आ फंसा है। जहाज पर कोई नहीं है। शिपिंग कॉरपोरेशन के अफसर को जहाज की जांच में अहसास होता है कि यहां अजीबोगरीब हरकतें होती हैं। उसे लगता है कि यहां कोई है। कौन...? कोई भूत या फिर...! क्या यह हकीकत है या सिर्फ उसका वहम क्योंकि खुद उसे भी तो अक्सर अपनी मरी हुई बीवी और बेटी दिखाई देती रहती हैं। कैसे मुक्ति दिलाएगा वह इस ‘भूत’ को और इस जहाज को? और क्या इसी में ही छुपी है खुद उसकी भी मुक्ति?
मुंबई के जुहू बीच पर जाने कहां से एक पुराना जहाज आ फंसा है। जहाज पर कोई नहीं है। शिपिंग कॉरपोरेशन के अफसर को जहाज की जांच में अहसास होता है कि यहां अजीबोगरीब हरकतें होती हैं। उसे लगता है कि यहां कोई है। कौन...? कोई भूत या फिर...! क्या यह हकीकत है या सिर्फ उसका वहम क्योंकि खुद उसे भी तो अक्सर अपनी मरी हुई बीवी और बेटी दिखाई देती रहती हैं। कैसे मुक्ति दिलाएगा वह इस ‘भूत’ को और इस जहाज को? और क्या इसी में ही छुपी है खुद उसकी भी मुक्ति?Wednesday, 2 October 2019
रिव्यू-यह ‘वॉर’ है मज़ेदार
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
‘अय्यारी’
फिल्म याद है आपको? सिद्धार्थ मल्होत्रा-मनोज वाजपेयी वाली उस फिल्म में आर्मी एजेंटों में से चेला अचानक से गद्दार हो गया था और उसका गुरु उसे तलाशने और खत्म करने निकल पड़ा था। लेकिन वो फिल्म इस कदर घिसी-पकी हुई थी कि मुझे रिव्यू-बिना तैयारी कैसी ‘अय्यारी’ लिखना पड़ा था। लगता है अपने कलपने का असर हुआ है क्योंकि इस फिल्म में ‘अय्यारी’ सरीखी ही कहानी को बहुत ही कायदे से, निखार के, संवार के, चमका के, इस कदर स्टाइलिश तरीके से परोसा गया है कि आप इसकी चकाचौंध में खोए बिना नहीं रह पाते। बस फर्क इतना है कि इस फिल्म में गुरु (हृतिक रोशन) गद्दार हो गया है और चेला (टाइगर श्रॉफ) उसकी तलाश में है।
‘अय्यारी’
फिल्म याद है आपको? सिद्धार्थ मल्होत्रा-मनोज वाजपेयी वाली उस फिल्म में आर्मी एजेंटों में से चेला अचानक से गद्दार हो गया था और उसका गुरु उसे तलाशने और खत्म करने निकल पड़ा था। लेकिन वो फिल्म इस कदर घिसी-पकी हुई थी कि मुझे रिव्यू-बिना तैयारी कैसी ‘अय्यारी’ लिखना पड़ा था। लगता है अपने कलपने का असर हुआ है क्योंकि इस फिल्म में ‘अय्यारी’ सरीखी ही कहानी को बहुत ही कायदे से, निखार के, संवार के, चमका के, इस कदर स्टाइलिश तरीके से परोसा गया है कि आप इसकी चकाचौंध में खोए बिना नहीं रह पाते। बस फर्क इतना है कि इस फिल्म में गुरु (हृतिक रोशन) गद्दार हो गया है और चेला (टाइगर श्रॉफ) उसकी तलाश में है।Friday, 1 March 2019
रिव्यू-धूल में लोटती ‘सोनचिरैया’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
जूनियर डाकू (ओह सॉरी, बीहड़ में बागी होत हैं, डकैत मिलते हैं पार्लामैंट में) लखना जब सीनियर बागी
मानसिंह से यह सवाल पूछता है तो उसे जवाब नहीं मिलता। कुछ देर बाद यही सवाल वह दूसरे
सीनियर बागी से पूछता है। उसे जवाब मिलता है-बागी का धरम होत है अपनी जात-बिरादरी की
रच्छा करना। तो, इस फिल्म में हर बागी अपनी
जात-बिरादरी के गैंग में रह कर अपनी जात-बिरादरी वालों की रच्छा कर रहा है और सोच रहा
है कि वह बहुत महान काम कर रहा है। लेकिन असल में वह भी जानता है कि उसकी यह ज़िंदगी
किसी नरक से कम नहीं। न खाने का पता, न हगने का। कई-कई दिन सोने को नहीं मिलता और पुलिस है कि कुत्तों की तरह सूंघती
फिरती है।
Friday, 3 August 2018
रिव्यू-इस ‘मुल्क’ में इतनी भी गर्म हवा नहीं
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक ऐसा परिवार जिसने 1947 के बंटवारे के वक्त मज़हब और मुल्क में से मुल्क को चुना, उसकी
देशभक्ति पर आप कैसे उंगली उठा सकते हैं...?
एक ऐसा परिवार जिसने 1947 के बंटवारे के वक्त मज़हब और मुल्क में से मुल्क को चुना, उसकी
देशभक्ति पर आप कैसे उंगली उठा सकते हैं...?
यह कैसा तर्क हुआ? इसका
मतलब सन् 47 में पाकिस्तान न जाने वाले सारे मुसलमान ज़बर्दस्त देशभक्त हैं तो फिर पाकिस्तान छोड़ कर आने वाले सारे हिन्दू देशद्रोही ही हुए? भई,
वो भी तो अपने (हिन्दू) मज़हब के लिए अपना (पाकिस्तान) मुल्क छोड़ कर आए थे न...!
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