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Wednesday, 18 March 2020

ओल्ड रिव्यू-उलझनें सुलझाते हैं ‘कपूर एंड सन्स’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
‘हर फैमिली में प्रॉब्लम होती हैं पर वो खुशनसीब हैं जिनकी कोई फैमिली होती है...।’
आप कहेंगे कि ‘कपूर एंड सन्स’ की समीक्षा में ‘प्रेम रतन धन पायो’ का डायलॉग क्यो?
दरअसल इस फिल्म की कहानी भी फैमिली प्रॉब्लम्स के इर्द-गिर्द ही घूमती है जो बताती है कि अपनी ईगो के चलते दूसरों की गलतियों को माफ और अपनी गलतियों को स्वीकार न करने में हम लोग अक्सर इतनी देर लगा देते हैं कि हमारा आज कड़वाहट में बीतने लगता है और आने वाला कल पछतावे में।

Wednesday, 21 November 2018

ओल्ड रिव्यू-‘एक्स-पास्ट इज़ प्रेज़ेंट’-कुछ खास लोगों के लिए

-दीपक दुआ...
हर फिल्म हर किसी के लिए नहीं होती। जब बड़ी-बड़ी मनोरंजन प्रधान फिल्मों को गरियाने और नापसंद करने वाले मिल जाते हैं तो ऐसे में छोटे बजट और अलग मिजाज की फिल्मों की तो बिसात ही क्या। ‘एक्स-पास्ट इज़ प्रेज़ेंट’ जिस फ्लेवर की फिल्म है, अव्वल तो उसे समझने वाले ही कम होंगे। समझ भी गए तो पसंद करेंगे या नहीं, यह भी साफ नहीं है। असल में इस किस्म की फिल्में खुद को और एक बेहद सीमित दर्शक वर्ग को ही संतुष्ट कर पाती हैं। अपने यहां जिसे हम ‘फेस्टिवल सिनेमा’ कहते हैं, यानी ऐसी फिल्म जो फिल्म समारोहों के बौद्धिक वातावरण में ही ज्यादा देखी और सराही जाती हैं, उस किस्म की फिल्म है यह।

Friday, 3 August 2018

रिव्यू-इस ‘मुल्क’ में इतनी भी गर्म हवा नहीं

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक ऐसा परिवार जिसने 1947 के बंटवारे के वक्त मज़हब और मुल्क में से मुल्क को चुना, उसकी देशभक्ति पर आप कैसे उंगली उठा सकते हैं...?

यह कैसा तर्क हुआ? इसका मतलब सन् 47 में पाकिस्तान न जाने वाले सारे मुसलमान ज़बर्दस्त देशभक्त हैं तो फिर पाकिस्तान छोड़ कर आने वाले सारे हिन्दू देशद्रोही ही हुए? भई, वो भी तो अपने (हिन्दू) मज़हब के लिए अपना (पाकिस्तान) मुल्क छोड़ कर आए थे न...!

Saturday, 3 March 2018

रिव्यू-‘परी’-कथा नहीं व्यथा है

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
किसी हाॅरर फिल्म से आखिर हमें क्या उम्मीद होती है? यही न कि उसमें कोई बुरी आत्मा होगी जो किसी के शरीर में घुस जाएगी। फिर वो उसे और उसके आसपास वालों को चैन से जीने नहीं देगी। कोई तांत्रिक, ओझा, पंडित, पादरी टाइप का बंदा आएगा। तंतर-मंतर होंगे, खून-खराबा होगा, फिर सब सही हो जाएगा। चलते-चलते एक सीन ऐसा भी आएगा कि फिल्म का सीक्वेल बन सके।