1999 में
हुई कारगिल
की लड़ाई
में भारत
ने क्या
खोया, क्या
पाया और
किस कीमत
पर पाया,
यह हम सब जानते
हैं। उस
युद्ध में
जान लड़ाने
और जान
गंवाने वाले
वीरों की
कहानियों को
सिनेमा में
भी दिखाया
गया जिनमें
से एक
‘एल.ओ.सी.
कारगिल’ ही
अब तक
सबसे प्रभावी
कही जा
सकती है।
करण जौहर
के बैनर
से अमेज़न
प्राइम पर
आई यह
फिल्म ‘शेरशाह’
भी उससे
ऊपर नहीं
उठ पाई
है। दरअसल
वॉर-हीरोज़
की कहानियों
का एक
तय ढर्रा
बना दिया
गया है।
उनका बचपन,
रोमांस, सेना
में जाने
की ललक
और सेना
में रह
कर दिखाए
गए शौर्य
के इर्द-गिर्द
ही ये
कहानियां घूमती
हैं। यह
फिल्म भी
वैसी ही
है।
Showing posts with label Sidharth Malhotra. Show all posts
Showing posts with label Sidharth Malhotra. Show all posts
Thursday, 12 August 2021
Wednesday, 18 March 2020
ओल्ड रिव्यू-उलझनें सुलझाते हैं ‘कपूर एंड सन्स’
आप कहेंगे कि ‘कपूर एंड सन्स’ की समीक्षा में ‘प्रेम रतन धन पायो’ का डायलॉग क्यो?
दरअसल इस फिल्म की कहानी भी फैमिली प्रॉब्लम्स के इर्द-गिर्द ही घूमती है जो बताती है कि अपनी ईगो के चलते दूसरों की गलतियों को माफ और अपनी गलतियों को स्वीकार न करने में हम लोग अक्सर इतनी देर लगा देते हैं कि हमारा आज कड़वाहट में बीतने लगता है और आने वाला कल पछतावे में।
दरअसल इस फिल्म की कहानी भी फैमिली प्रॉब्लम्स के इर्द-गिर्द ही घूमती है जो बताती है कि अपनी ईगो के चलते दूसरों की गलतियों को माफ और अपनी गलतियों को स्वीकार न करने में हम लोग अक्सर इतनी देर लगा देते हैं कि हमारा आज कड़वाहट में बीतने लगता है और आने वाला कल पछतावे में।
Saturday, 16 November 2019
रिव्यू-मसालों की बौछार में रपट कर ’मरजावां’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
चेतावनी : मसालेदार, चटपटी, बे-दिमाग
फिल्में देखने, पसंद करने
वाले ही आगे
पढ़ें। बाकी लोग
यहीं से पलट
लें वरना रपट
जाएंगे।
चेतावनी : मसालेदार, चटपटी, बे-दिमाग
फिल्में देखने, पसंद करने
वाले ही आगे
पढ़ें। बाकी लोग
यहीं से पलट
लें वरना रपट
जाएंगे।
मुंबई अंडरवर्ल्ड का
डॉन नारायण अन्ना।
उसके बेटे जैसा
हीरो रघु जो
उसके एक इशारे
पर जान ले-ले, दे-दे।
इस बात से
खफा उसका असली
बेटा विष्णु रघु
को दुश्मन मान
बैठा है। रघु
पर फिदा तवायफ
आरज़ू। लेकिन रघु
का दिल आया
कश्मीर से आई
ज़ोया पर। ज़ोया
उसे सुधारना चाहती
है। रघु-विष्णु
की भिड़ंत में
बेकसूर लोग मरने
लगे तो रघु
बागी हो उठा।
लेकिन अन्ना के
नमक ने उसे
रोक लिया। आखिर
एक दिन रघु
ने बुरे लोगों
को मार ही
डाला।
Friday, 9 August 2019
रिव्यू-‘जबरिया जोड़ी’ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
बिहार के कुछ इलाकों में ‘पकड़ुआ विवाह’ का चलन है। अपनी बेटी के लिए दहेज
या किसी अन्य कारण से उपयुक्त वर न खोज पाने के चलते किसी लड़के को जबरन उठवा कर उससे
अपनी बेटी को ब्याह देने के इस काम में दबंगों, गुंडों की मदद ली जाती है। यह फिल्म भी इसी पर बेस्ड है। हीरो
अपने दबंग बाप के कहने पर अपने गुंडे दोस्तों की मदद से जबरिया शादी करवाने की ‘समाज सेवा’ करता फिरता है। बचपन में बिछड़ी
हीरोइन उसे मिली तो दोनों के भीतर प्यार जगा। पर कभी परिवार आड़े आ गए तो कभी दोनों
के अहं। लेकिन प्यार तो प्यार होता है, कभी तो फूटेगा ही।
बिहार के कुछ इलाकों में ‘पकड़ुआ विवाह’ का चलन है। अपनी बेटी के लिए दहेज
या किसी अन्य कारण से उपयुक्त वर न खोज पाने के चलते किसी लड़के को जबरन उठवा कर उससे
अपनी बेटी को ब्याह देने के इस काम में दबंगों, गुंडों की मदद ली जाती है। यह फिल्म भी इसी पर बेस्ड है। हीरो
अपने दबंग बाप के कहने पर अपने गुंडे दोस्तों की मदद से जबरिया शादी करवाने की ‘समाज सेवा’ करता फिरता है। बचपन में बिछड़ी
हीरोइन उसे मिली तो दोनों के भीतर प्यार जगा। पर कभी परिवार आड़े आ गए तो कभी दोनों
के अहं। लेकिन प्यार तो प्यार होता है, कभी तो फूटेगा ही।Saturday, 17 February 2018
रिव्यू-बिना तैयारी कैसी ‘अय्यारी’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पिछले दिनों जिस किसी के भी सामने इस फिल्म का जिक्र हुआ तो यह सवाल सबसे पहले पूछा गया। यानी आप बिना आगे कुछ पढ़े यह समझ लीजिए कि कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो अपने नाम से ही पिटने लगती हैं। ‘अय्यारी’ उन्हीं में से एक है।
Friday, 3 November 2017
रिव्यू-क्लासिक फिल्में ‘इत्तेफाक’ नहीं होतीं
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
दो कत्ल, दो कहानियां, लेकिन सच सिर्फ एक। या फिर वह
भी नहीं। मर्डर मिस्ट्री फिल्मों का बरसों पुराना फ़ॉर्मूला। फिर यह फिल्म तो बी.आर.
चोपड़ा के बैनर से 1969 में आई राजेश खन्ना-नंदा वाली इसी नाम की फिल्म का ही रीमेक
है। कहानी का ढांचा लगभग वही है कि अपनी बीवी के कत्ल का आरोपी हीरो पुलिस से बच कर
भागते हुए एक ऐसे घर में जा पहुंचता है जहां हीरोइन के पति का कत्ल हुआ है। अब उस पर
दो-दो खून का आरोप है। उसका कहना है कि कातिल वह नहीं जबकि सबूत और हालात उसके खिलाफ
हैं।
रिव्यू सुनने के लिए नीचे क्लिक करें...
इस किस्म की फिल्मों का सीधा और बड़ा उसूल रहता है कि जिस पर शक है,
वही कातिल नहीं होता। अभय
ने इस राज़ को बरकरार रखा है और यह उनकी सफलता है। स्क्रिप्ट को उन्होंने जिस तरह से
पलटा है, उसमें उनकी मेहनत झलकती है। फिल्म के सैट्स और लोकेशन इसे रियल लुक देते हैं। लेकिन
कुछ है जो इस फिल्म को आपके सिर पर नहीं चढ़ने देता, आपके दिलों में नहीं उतरने देता।
कई सवाल अधूरे-से दिखते हैं और अंत में लाया गया ट्विस्ट जबरन-सा।
दो कत्ल, दो कहानियां, लेकिन सच सिर्फ एक। या फिर वह
भी नहीं। मर्डर मिस्ट्री फिल्मों का बरसों पुराना फ़ॉर्मूला। फिर यह फिल्म तो बी.आर.
चोपड़ा के बैनर से 1969 में आई राजेश खन्ना-नंदा वाली इसी नाम की फिल्म का ही रीमेक
है। कहानी का ढांचा लगभग वही है कि अपनी बीवी के कत्ल का आरोपी हीरो पुलिस से बच कर
भागते हुए एक ऐसे घर में जा पहुंचता है जहां हीरोइन के पति का कत्ल हुआ है। अब उस पर
दो-दो खून का आरोप है। उसका कहना है कि कातिल वह नहीं जबकि सबूत और हालात उसके खिलाफ
हैं।रिव्यू सुनने के लिए नीचे क्लिक करें...
अभय चोपड़ा अगर उसी पुरानी कहानी को नए तरीके से फिल्मा देते तो बात कुछ अधूरी-सी
रह जाती क्योंकि वह कहानी तो अब सब को पता है। सो, एक तो उन्होंने इसमें कुछ नए ट्विस्ट
डालें हैं और दूजे उन्होंने इसे कहने का स्टाइल बदला है। फिल्म के आखिर में एक बड़ा
ट्विस्ट आकर चौंकाता है लेकिन साथ ही कुछ हद तक निराश भी करता है कि इससे तो अपराध
और अपराधी को ग्लैमराइज कर दिया गया।
इस किस्म की फिल्मों का सीधा और बड़ा उसूल रहता है कि जिस पर शक है,
वही कातिल नहीं होता। अभय
ने इस राज़ को बरकरार रखा है और यह उनकी सफलता है। स्क्रिप्ट को उन्होंने जिस तरह से
पलटा है, उसमें उनकी मेहनत झलकती है। फिल्म के सैट्स और लोकेशन इसे रियल लुक देते हैं। लेकिन
कुछ है जो इस फिल्म को आपके सिर पर नहीं चढ़ने देता, आपके दिलों में नहीं उतरने देता।
कई सवाल अधूरे-से दिखते हैं और अंत में लाया गया ट्विस्ट जबरन-सा।
एक्टिंग के मोर्चे पर भी यह मात खाती है। सिद्धार्थ मल्होत्रा और सोनाक्षी सिन्हा,
दोनों ही औसत अदाकार हैं
और इन्हें मिलीं भूमिकाएं भी साधारण ही थीं जिन्हें ये साधारण तरीके से निबटाते नजर
आए। दमदार रोल मिला पुलिस अफसर बने अक्षय खन्ना को और उन्होंने इसे दमदार ढंग से निभाया
भी। पुलिस कर्मी बने सभी सहायक अभिनेता कहीं ज्यादा असरदार रहे।
फिल्म में गाने नहीं हैं। इनकी जरूरत भी नहीं थी। लेकिन ऐसी फिल्मों में बैकग्राउंड
म्यूजिक बेहद प्रभावी होना चाहिए जो यहां नहीं है।
इस तरह की कहानी में जिस किस्म के पैनेपन और धार की जरूरत होती है,
वह भी इसमें कम ही दिखी।
ऐसे में कहीं-कहीं यह सूखी भी लगने लगती है। कुर्सी से चिपके रह कर मर्डर मिस्ट्री
देखने का जबर्दस्त वाला शौक हो तो ही यह आपको पसंद आ सकती है वरना तो पुरानी वाली ‘इत्तेफाक’
देख कर ही काम चला लीजिए
क्योंकि वैसी क्लासिक फिल्में इत्तेफाक से नहीं बना करतीं।
अपनी रेटिंग-ढाई स्टार
Subscribe to:
Posts (Atom)


