Thursday, 16 May 2019

रिव्यू-देखने लायक हरियाणवी फिल्म ‘छोरियां छोरों से कम नहीं होतीं’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Review)
‘दंगल’ के ताऊ आमिर खान ने पूछा था-‘म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के...?’ अब यह हरियाणवी फिल्म उसी के जवाब में कह रही है-‘छोरियां छोरों से कम नहीं होतीं।’ बता दूं कि 2016 में आई ‘सतरंगी’ के बाद अब जाकर कोई हरियाणवी फिल्म रिलीज़ हुई है। ज़ी स्टूडियो और सतीश कौशिक इसके निर्माता हैं और सतीश के असिस्टैंट रहे राजेश अमरलाल बब्बर इसके निर्देशक।

कहानी इसकी साधारण-सी है। हरियाणा के एक गांव में छोरे की चाहत रखने वाले जयदेव चौधरी के घर में जब दूसरी भी छोरी आई तो वह निराश हो गया। लेकिन उसी दूसरी बेटी बिनीता ने हर मैदान में छोरों को मात दी और एक दिन आई.पी.एस. अफसर बन कर माता-पिता का सिर फख्र से ऊंचा कर दिया।

Wednesday, 15 May 2019

रिव्यू-फिल्म नहीं, लानत है ‘स्टूडैंट ऑफ द ईयर 2’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
चलो-चलो एक फिल्म बनाएं। कुछ चमकदार चेहरे जुटाएं। उन चेहरों पर मेकअप की परतें चढ़ाएं। उन्हें रंगीन कपड़े पहनाएं। माहौल को चकाचौंध बनाएं। रही कहानी की बात, तो उसे भूल जाएं। चलो, पब्लिक को बेवकूफ बनाएं। चलो-चलो एक फिल्म बनाएं।

2012 में आई ‘स्टुडैंट ऑफ द ईयर’ की ही तरह इस फिल्म में भी भरपूर रंगीनियत है। देहरादून के एक शानदार कॉलेज में दोस्ती-दुश्मनी निभाते युवाओं की कहानी है। एक तरफ हर हुनर में माहिर अपना गरीब हीरो है। दूसरी तरफ कॉलेज के सबसे हैंडसम और अमीर लौंडे (ज़ाहिर है कॉलेज के ट्रस्टी के बेटे) में भी हर हुनर है। डांस, रोमांस, गाना-बजाना, पीटना, कबड्डी वगैरह-वगैरह। गरीब की गर्लफ्रैंड इस अमीर पर मरती है और अमीर की नकचढ़ी बहन को गरीब अपनी तरफ खींच लेता है। पढ़ाई-वढ़ाई इस कॉलेज में होती नज़र नहीं आती। टीचर यहां के जोकरनुमा हैं। मोबाइल फोन पूरी फिल्म में किसी के पास नहीं दिखता। नेटवर्क प्रॉब्लम होगी शायद।

Wednesday, 8 May 2019

रिव्यू-काश, थोड़ी और सैट होती ‘सैटर्स’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
अक्सर खबरों में दिखाई-सुनाई देता है कि फलां इम्तिहान में जम कर नकल चली, असली उम्मीदवार की जगह कोई और पेपर देता पकड़ा गया या पैसे लेकर सैटिंग हुई और पेपर पहले ही लीक हो गए। मन करता है यह जानने का कि आखिर वे कौन लोग हैं जो सैटिंग के इन कामों को अंजाम देते हैं? कैसे करते हैं ये लोग हर लेवल पर जाकर ऐसी सैटिंग कि किसी को पता भी नहीं चलता? या फिर पता तो सब को होता है लेकिन कोई सामने नहीं आता? तो क्या इस खेल में सिस्टम और उसकी मशीनरी भी शामिल होती है? अश्विनी चौधरी की यह फिल्म इन सारे सवालों के जवाब तलाशती है और खुल कर इस छुपे हुए खेल को दिखाती है जिसे करने वालों को सैटर्स कहा जाता है।

Thursday, 2 May 2019

रिव्यू-इतनी भी कोरी नहीं ‘ब्लैंक’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
एक युवक को रोड-एक्सीडैंट के बाद अस्पताल लाया जाता है। डॉक्टर पाते हैं कि उसके सीने पर ऑपरेशन के ज़रिए एक बम कुछ इस तरह से फिट है कि उसकी धड़कन रुकी तो बम फटा। युवक को याद नहीं वह कौन है-आतंकवादी या कोई और। पुलिस उसे मारना चाहती है। तभी पता चलता है कि इस बम से 24 बमों को सिग्नल जा रहे हैं। यह फटा तो वे भी फटे। पुलिस जुटी है सारे खेल का खात्मा करने में। अंत में एक ट्विस्ट आता है और...!