हैडिंग पढ़ कर चौंकिए मत, यह सच है। जी हां, एक फिल्मकार ने अपनी बनाई एक फिल्म के लिए यह अनोखा बिज़नेस मॉडल पेश किया है जिसमें वह दर्शकों को अपनी फिल्म मुफ्त में दिखा रहे हैं और यह गुज़ारिश कर रहे हैं कि अगर आपको यह फिल्म पसंद आए तो उन्हें थोड़े पैसे भेज दीजिए। थोड़े मतलब कुछ भी, दस, बीस, पचास रुपए, या जो भी आप चाहें।
Tuesday, 9 February 2021
Thursday, 4 February 2021
2020 की बेहतरीन फिल्में-किसे मिलेगा अवार्ड?
-दीपक दुआ...
देश के चुनिंदा फिल्म
समीक्षकों की संस्था ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ हर साल की तरह इस बार भी ‘क्रिटिक्स
चॉइस अवार्ड’ देने जा रही है। इस बार होने जा रहे अवार्ड्स के लिए साल 2020 में थिएटरों के अलावा ढेरों ओ.टी.टी. मंचों पर रिलीज़ हुईं फिल्मों
को क्रिटिक्स की कई टीमों ने देखा और कई राउंड्स के बाद उनमें से चुनिंदा फिल्मों
व उनसे जुड़े लोगों को फाइनल में जगह मिली। अब इन फिल्मों को गिल्ड के तमाम सदस्य
क्रिटिक्स रैंकिंग दे रहे हैं जिनमें से सर्वश्रेष्ठ को पुरस्कृत किया जाएगा।
मुमकिन है आप लोगों ने इनमें से कुछ फिल्में देखी हों। न देखी हों
तो देख डालिए क्योंकि ये पिछले साल की बेहतरीन फिल्में हैं। आइए, इनके नामांकनों पर नज़र डालते हैं-
रिव्यू-इच्छाओं और ज़रूरतों का ‘आखेट’
किसी नेशनल
पार्क में
बाघ देखने
जाइए तो
अपने गाइड
की बातों
पर गौर
कीजिएगा। ‘आज
सुबह ही
यहां बाघ दिखा था’,
‘इसी जगह
रोज़ पानी
पीने आता
है’, ‘यह
देखिए बाघ
के पंजों
के निशान’,
‘इसी झाड़ी
के पीछे
छुपा है’
जैसी बातों
से ये
गाइड पर्यटकों
को आश्वस्त
करते रहते
हैं कि
बाघ अभी
दिखेगा, अभी
दिखेगा और
दर्शक पहले
उत्साह में
और फिर
मायूसी में
जंगल घूम-घाम कर
लौट आता
है। यह
फिल्म भी
कुछ ऐसी
ही है
जिसमें बाघ
के शिकार
पर गए
एक शख्स
और उसे
शिकार पर
ले जाने
वाले कुछ
लोगों की
कहानी है।
Sunday, 31 January 2021
भारत की ‘जल्लीकट्टू’ का ऑस्कर में इन फिल्मों से है मुकाबला
-दीपक दुआ...
अमेरिका की ऑस्कर अकादमी से मेल आया है। ‘सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म’ (जिसे पहले ‘विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म’ कहा जाता था) के पुरस्कार के लिए इस बार भारत ने मलयालम की ‘जल्लीकट्टू’ को भेजा है। भारत के अलावा 92 और देशों से फिल्में इस मुकाबले में उतरी हैं। उन फिल्मों और उनके देशों के नाम ये हैं, देख लीजिए-
रिव्यू-सिर्फ पढ़ाते नहीं, सोच भी बदलते हैं ‘मास्साब’
किसी गांव की प्राथमिक पाठशाला में एक मास्साब (मास्टर साहब) आए। आए तो पाठशाला की हालत खस्ता थी। असली की जगह नकली टीचर पढ़ा रहे थे। बच्चे भी बस मिड-डे मील के लालच में आते, घटिया खाना खाते और निकल लेते। मास्साब ने सुधार लाने शुरू किए तो धीरे-धीरे पाठशाला के साथ-साथ वहां के बच्चों, उस गांव और गांव के लोगों तक में सुधार आने लगा। कुछ समय बाद जब मास्साब वहां से विदा हुए तो पूरे गांव की आंखों में आंसू थे।
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