Thursday, 9 April 2020

वेब-रिव्यू : लचर कहानी पर बनी ‘शी’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
मुंबई पुलिस की एंटी नारकोटिक्स सेल किसी पुलिस स्टेशन से एक आम कांस्टेबल को अपने साथ जोड़ कर उसे कॉल गर्ल बना कर नशे के सौदागरों के पास भेजती है। टार्गेट है इनके सरगना नायक को पकड़ना। पहले पकड़ में आता है नायक का खास आदमी सस्या। उसकी दी हुई खबरों से पुलिस आगे बढ़ती है और नायक तक पहुंचना चाहती है। क्या वह सफल होती है? क्या वह लड़की इन लोगों को रिझा पाने में कामयाब हो पाती है जो शक्ल-सूरत से इतनी आम है कि खुद उसका पति तक उसे छोड़ देता है?

Sunday, 5 April 2020

रिव्यू-जूझने पर मजबूर करती ‘राक्खोश’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक पागलखाना। वहां बंद सैंकड़ों पागल। उनकी पागलों वाली हरकतें। स्टाफ का अजीबोगरीब व्यवहार। हर रोज़ वहां से गायब होता कोई पागल। साज़िश या संयोग? इसकी तफ्तीश करते कुछ लोग। क्या वहां कुछ गोलमाल चल रहा है या फिर सचमुच कोई राक्खोश (राक्षस) आकर किसी को ‘शू..’ कर देता है?

Tuesday, 31 March 2020

रिपोर्ट कार्ड-पहली तिमाही में ‘तान्हा जी’ की धूम


-दीपक दुआ...
2020 की पहली तिमाही खत्म हुई। हर साल की तरह इस साल के पहले तीन महीनों में भी ढेरों फिल्में रिलीज़ हुईं और इनमें से काफी सारी फिल्मों ने बॉक्स-ऑफिस पर रंग भी बिखेरे। मार्च के मध्य में आकर अगर कोरोना की महामारी के चलते सिनेमाघरों पर ताला नहीं लगता तो बेशक ये रंग और भी निखरते। खैर, आइए इस साल के पहले तीन महीने में रिलीज़ हुई फिल्मों के मिज़ाज और हिसाब-किताब पर नज़र दौड़ाएं।

Sunday, 29 March 2020

यादें-फारूक़ शेख से हुई वह बातचीत

-दीपक दुआ...
अपने पिछले आलेख में मैंने ज़िक्र किया था कि 1994 में किस तरह से अभिनेता फारूक़ शेख से मेरी
मुलाकात का अजब संयोग बना था। उस मुलाकात में उनसे हुई बातचीत 2 अप्रैल, 1994 के ‘हिन्दुस्तान’ अखबार में छपी। अंश पढ़िए-
आज हिन्दी सिनेमा को दो वर्गों में बांट कर देखा जाता है-कला सिनेमा और व्यावसायिक सिनेमा। आप इस वर्गीकरण से कहां तक सहमत हैं?
ये सब पत्रकारों और मीडिया की बनाई हुई चीज़ है। वो जैसे आदत होती है न कुछ लोगों की एक चीज़ को किसी दायरे में बांध कर देखने की, एक कैप्शन देने की। वैसे ही इन फिल्मों को, जो कुछ हट कर बनाई गई थीं, लोगों ने आर्ट का नाम दे दिया। आर्ट तो सभी तरह की फिल्मों में है। क्या जो मनमोहन देसाई ने बनाया या सुभाष घई ने बनाया, उसमें आर्ट नहीं है? आप विमल रॉय की फिल्में देखिए, शांताराम की, गुरुदत्त की फिल्में देखें, इन सबमें बेशुमार आर्ट है। अब आप ‘ज्यूरासिक पार्क’ को ही ले लीजिए। उसमें कहानी समझ के बाहर है। पर असाधारण आर्ट है उसमें और ये फिल्में व्यावसायिक तौर भी सफल हैं।

यादें-फारूक़ शेख से मुलाकात का वह अजब संयोग

-दीपक दुआ...
1993 का बरस। अपना लिखना-छपना शुरू हो चुका था। शाम को पत्रकारिता में पी.जी. डिप्लोमा की क्लास के साथ-साथ दिन में हिन्दी दैनिक ‘जनसत्ता’ के डेस्क पर खुद को मांजने का दौर चल रहा था। उन दिनों कला और व्यावसायिक यानी आर्ट और कमर्शियल सिनेमा की तकरार चरम पर थी। ऐसे में पत्रकारिता के कोर्स में मैंने अपने प्रोजेक्ट का विषय चुना ‘हिन्दी सिनेमा-कुछ नए आयाम’ और तय किया कि इसके ज़रिए मैं यह स्थापित करने की कोशिश करूंगा कि न दुरूह किस्म का कला और न ही मसालों से भरा व्यावसायिक, बल्कि इन दोनों के बीच का मध्यमार्गी सिनेमा ही भविष्य का सिनेमा होगा। इस प्रोजेक्ट के लिए की गईं ढेरों कोशिशों में से एक थी-छह स्थापित फिल्म समीक्षकों और छह कलाकारों के इंटरव्यू। इसके लिए मैंने एक प्रश्नावली बना कर मुंबई में कुछ कलाकारों, फिल्मकारों को उनके पते पर भेज दी जिनमें से ‘गर्म हवा’ वाले निर्देशक एम.एस. सत्यु का जवाब भी आया। (वह किस्सा यहां क्लिक करके पढ़ें) इसके अलावा दिल्ली के श्रीराम सेंटर जाकर दिल्ली के कलाकारों की एक डायरेक्टरी खरीदी और दिल्ली में मौजूद फिल्म, टी.वी. और थिएटर से जुड़े लोगों को फोन कर-करके उनसे मिलने की कोशिशें करने लगा। अदाकारा ज़ोहरा सहगल, शर्मिला टैगोर समेत कइयों से फोन पर बात भी हुई लेकिन मुलाकात का संयोग नहीं बन पाया। अजब बात तो यह है कि मुलाकात तो उस शख्स से (आज तक) भी नहीं हुई, जिनके ज़रिए मैं अभिनेता फारूक़ शेख तक जा पहुंचा। जानते हैं कौन थे वो...?