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Sunday, 5 April 2020

रिव्यू-जूझने पर मजबूर करती ‘राक्खोश’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक पागलखाना। वहां बंद सैंकड़ों पागल। उनकी पागलों वाली हरकतें। स्टाफ का अजीबोगरीब व्यवहार। हर रोज़ वहां से गायब होता कोई पागल। साज़िश या संयोग? इसकी तफ्तीश करते कुछ लोग। क्या वहां कुछ गोलमाल चल रहा है या फिर सचमुच कोई राक्खोश (राक्षस) आकर किसी को शू..कर देता है?

Tuesday, 2 October 2018

मिलिए ‘सुई धागा’ की अम्मा यामिनी दास से

-दीपक दुआ...
हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म सुई धागाके तमाम कलाकारों की तारीफें हो रही हैं। उन कलाकारों की भी जिनके नाम तक से लोग अनजान हैं। इस फिल्म में मौजी यानी वरुण धवन की अम्मा बनीं अदाकारा को देख कर लगता है कि यू.पी. के किसी कस्बे के किसी आम परिवार की अम्मा ऐसी ही तो होती हैं। इस फिल्म का रिव्यू करते समय इस अदाकारा के बारे में पड़ताल की तो पता चला कि उनका नाम यामिनी दास है और... और बस। लेकिन रिव्यू पोस्ट किया तो यामिनी दास से जुड़ना हो गया। उनसे जुड़े तो ढेरों बातें हुईं। पहले तो उन्होंने मेरे रिव्यू (रिव्यू-‘सुई धागा’ में सब बढ़िया है) की तारीफ की और जब उन्हें पता चला कि मैं फिल्मी कलियांजैसी फिल्म-पत्रिका से बरसों तक जुड़ा रहा हूं तो वह बहुत खुश हुई।


उसके बाद मुझे यामिनी के बारे में जो पता चला उसे जान कर मुझे तो हैरानी हुई ही, आपको भी होगी कि यामिनी मशहूर ग़ज़ल-गायक चंदन दास की पत्नी हैं, कि वो अभिनेता नमित दास (जो सुई धागामें गुड्डू बने हैं) की मां हैं और सबसे बड़ी बात यह कि सुई धागायामिनी की पहली फिल्म है।

Saturday, 29 September 2018

रिव्यू-‘सुई धागा’ में सब बढ़िया है

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
दिल्ली से सटा यू.पी. का कोई कस्बा। एक बिल्कुल ही आम परिवार। अभावों से जूझता। रहने को ढंग की जगह, सुविधाएं, जेब भर पैसा, कायदे का काम। फिर भी सब बढ़िया है। बीवी ममता के कहने पर मौजी भैया नौकरी छोड़ कर लग गए अपना ही कुछकरने। ढेरों अड़चनें आईं। कुछ अपनों ने साथ छोड़ा तो कुछ परायों ने हाथ बंटाया। लेकिन हिम्मत हारी दोनों ने और जुटे रहे। अंत में तो इन्हें जीतना ही हुआ।

अभावग्रस्त और बिल्कुल नीचे से उठ कर कुछ बड़ा हासिल करने की अंडरडॉगकिस्म की कहानियां दर्शकों को हमेशा से लुभाती रही हैं। लेकिन यह कहानी सिर्फ मौजी और ममता की ही नहीं है। उनकी हिम्मत, संघर्ष, मेहनत से कुछ बड़ा हासिल करने की ही नहीं है। बल्कि यह अपने भीतर और भी बहुत कुछ ऐसा समेटे हुए है जिसके बारे में मुख्यधारा का सिनेमा आमतौर पर बात नहीं करता है। या कहें कि बॉक्स-ऑफिस के समीकरण उसे ऐसा करने से रोकते हैं।

रिव्यू-‘पटाखा’ फूटा मगर धीमे से

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अगर आप विशाल भारद्वाज की फिल्मों के फैन हैं तो आपने इस फिल्म का ट्रेलर जरूर देखा होगा। और अगर आपने इस फिल्म का ट्रेलर देखा है तो आपको इंटरवल तक की फिल्म देखने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। जी हां, इंटरवल तक की फिल्म के सारे अहम दृश्य ट्रेलर में चुके हैं। आप चाहें तो इंटरवल तक एक अच्छी नींद ले सकते हैं। अब रही बात इंटरवल के बाद की। तो यह हिस्सा भी आपको तभी पसंद आएगा जब आपके अंदर विशाल भारद्वाज की फिल्मों के लिए मजनू-रांझा वाली दीवानगी हो। वरना इस दौरान भी आप सो सकते हैं। अब पैसे खर्च के थिएटर में सोने ही जाना है, तो आपकी मर्जी।