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Monday, 24 August 2020
Wednesday, 23 October 2019
रिव्यू-बदलती हवा का रुख बतलाती ‘सांड की आंख’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पिछली सदी के आखिरी दिनों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गांव में साठ की उम्र पार कर चुकीं दो दादियों ने निशानेबाजी शुरू की और देखते ही देखते ढेरों राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुकाबले जीत कर पदकों का ढेर लगा दिया और दुनिया भर में शूटर-दादी के नाम से मशहूर हुईं। पर क्या इनका यह सफर इतना आसान रहा होगा? पूरी ज़िंदगी घूंघट के अंदर काटने और हर किसी की चाकरी करने के बाद समाज के पितृसत्तात्मक रवैये के सामने उठ खड़े होने की हिम्मत कहां से आई होगी इनके भीतर? कैसे इन्होंने उन तमाम बाधाओं को लांघा होगा जो इनकी राह में कभी पति,
कभी बेटे, कभी समाज के तानों, कभी परंपराओं की बेड़ियों के रूप में सामने आई होंगी। यह फिल्म इनके इसी सफर को,
इस सफर के दौरान किए गए संघर्ष को दिखाती है और बड़े ही कायदे से दिखाती है।
पिछली सदी के आखिरी दिनों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गांव में साठ की उम्र पार कर चुकीं दो दादियों ने निशानेबाजी शुरू की और देखते ही देखते ढेरों राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुकाबले जीत कर पदकों का ढेर लगा दिया और दुनिया भर में शूटर-दादी के नाम से मशहूर हुईं। पर क्या इनका यह सफर इतना आसान रहा होगा? पूरी ज़िंदगी घूंघट के अंदर काटने और हर किसी की चाकरी करने के बाद समाज के पितृसत्तात्मक रवैये के सामने उठ खड़े होने की हिम्मत कहां से आई होगी इनके भीतर? कैसे इन्होंने उन तमाम बाधाओं को लांघा होगा जो इनकी राह में कभी पति,
कभी बेटे, कभी समाज के तानों, कभी परंपराओं की बेड़ियों के रूप में सामने आई होंगी। यह फिल्म इनके इसी सफर को,
इस सफर के दौरान किए गए संघर्ष को दिखाती है और बड़े ही कायदे से दिखाती है। Friday, 17 August 2018
रिव्यू-फीकी चमक वाला ‘गोल्ड’
1936 के बर्लिन ओलंपिक में गुलाम भारत यानी ब्रिटिश इंडिया की हॉकी टीम ने गोल्ड मैडल तो जीता लेकिन स्टेडियम में ब्रिटेन का राष्ट्रगान बज रहा था। देश आज़ाद हुआ तो उसी टीम के जूनियर मैनेजर ने सपना देखा कि 1948 के लंदन ओलंपिक में भारतीय टीम ‘दो सौ साल की गुलामी’
के बाद जीते और अपने ‘जन गण मन...’ की धुन पर गोल्ड लेकर आए। और बस,
वो जुट गया तमाम बाधाओं के बीच एक जानदार टीम तैयार करने में जो एक शानदार जीत हासिल कर सके।
यह सही है कि 1948 में भारतीय टीम ने लंदन ओलंपिक में ब्रिटेन को उसी के घर में 4-0 से हरा कर गोल्ड जीता था। लेकिन इतिहास यह नहीं बताता कि वो सपना किसी टीम-मैनेजर का था। लेकिन यह फिल्म है जनाब, जो इतिहास के कुछ सच्चे किस्सों में ढेर सारी कल्पनाएं मिला कर आपको देशप्रेम की ऐसी चाशनी चटाती है कि आप बिना कुछ आगा-पीछा सोचे बस,
उसे चाटते चले जाते हैं।
Sunday, 29 April 2018
रिव्यू-सरकार, यह ‘देव’ तो ‘दास’ निकला
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
चलो सरकार, फिल्म बनाते हैं। पर ‘सरकार’ तो रामू बना चुके हैं। तो चलो
उसमें ‘हैमलेट’ मिलाते हैं। मगर उस पर विशाल भारद्वाज
‘हैदर’ बना चुके हैं। तो फिर ऐसा करते
हैं ‘देवदास’ भी मिला देते हैं। हीरो का नाम
देव, उसकी सखी का पारो रख देते हैं।
थोड़ी-थोड़ी ‘ओंकारा’, ‘मकबूल’, ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’, ‘राजनीति’, ‘हु तु तु’, ’सत्ता’ और ऐसे ही फ्लेवर वाली फिल्में
भी ले लेते हैं। कुछ तो बन ही जाएगा।
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार
हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय।
मिजाज से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित
लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)
चलो सरकार, फिल्म बनाते हैं। पर ‘सरकार’ तो रामू बना चुके हैं। तो चलो
उसमें ‘हैमलेट’ मिलाते हैं। मगर उस पर विशाल भारद्वाज
‘हैदर’ बना चुके हैं। तो फिर ऐसा करते
हैं ‘देवदास’ भी मिला देते हैं। हीरो का नाम
देव, उसकी सखी का पारो रख देते हैं।
थोड़ी-थोड़ी ‘ओंकारा’, ‘मकबूल’, ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’, ‘राजनीति’, ‘हु तु तु’, ’सत्ता’ और ऐसे ही फ्लेवर वाली फिल्में
भी ले लेते हैं। कुछ तो बन ही जाएगा।
तो साहब, यह जो ‘कुछ’ बन कर आया है इसमें बाहुबलियों
वाला बैकग्राउंड है। राजनीतिक परिवार की कहानी है। सत्ता और पॉवर के नशे का मिक्सचर
है। प्यार और धोखे का तड़का है। उठा-पटक है, गोलियां हैं, गालियां हैं। बस नहीं है तो वह
सुधीर मिश्रा और उनका वाला टच जिसके शैदाई कभी हम जैसे लोग हुआ करते थे।
फिल्म की कहानी तो जो है सो है ही, इसकी स्क्रिप्ट इतनी ज्यादा जटिल और उलझी हुई है कि यकीन नहीं होता कि आप उन्हीं
सुधीर मिश्रा की फिल्म देख रहे हैं जो डार्क कहानियों को भी इस सरलता से बयान कर दिया
करते थे कि उनके निगेटिव किरदारों से भी इश्क-सा होने लगता था। इस कहानी के ढेरों किरदारों
में से तो एक भी पात्र ऐसा नहीं निकला जो आपकी हमदर्दी ले जा सके।
एक्टिंग कई लोगों की जबर्दस्त है। सौरभ शुक्ला और विपिन शर्मा तो भरपूर छाए रहे।
दिलीप ताहिल, अदिति राव हैदरी, ऋचा चड्ढा, विनीत कुमार सिंह भी उम्दा रहे।
देव बने राहुल भट्ट हालांकि इस सारे मजमे में सबसे कमजोर रहे लेकिन अपनी तरफ से वह
भी भरपूर कोशिशें करते नजर आए। अनुराग कश्यप भी हैं। बुल्ले शाह और फैज़ की रचनाएं लेने
के बाद ढेरों गीतकारों-संगीतकारों की भीड़ से जो गाने तैयार करवाए गए वे भी इस फिल्म
की तरह ही औसत रह गए।
यह फिल्म देखते हुए महसूस होता है कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री किस तरह से उन फिल्मकारों
के जेहन में भी घिसे-पिटे रास्तों पर चलने और दूसरों से मुकाबला करने का दबाव बनाती
है जो कभी अपनी राह खुद बनाया करते थे। अफसोस, कि सुधीर मिश्रा भी इस दबाव के सामने दास बन गए।
अपनी रेटिंग-डेढ़ स्टार
Thursday, 11 January 2018
रिव्यू-बेदाग नहीं है अनुराग की ‘मुक्काबाज़’
अनुराग कश्यप लौट आए हैं। अपने उसी पुराने रंग में, उसी जाने-पहचाने ढंग में।
बरेली शहर का श्रवण सिंह मुक्केबाज़ी में कैरियर बनाना चाहता है। कोच भगवान दास मिश्रा के घर में वह बाकी बाॅक्सरों की तरह नौकरों वाले काम करने से मना करते हुए उन पर हाथ उठा बैठता है। भगवान कसम खा लेता है कि उसे कहीं से भी खेलने नहीं देगा। लेकिन श्रवण जुटा रहता है। एक दिक्कत यह भी है कि श्रवण को प्यार भी भगवान की गूंगी भतीजी सुनयना से हुआ है जिसे पाने के लिए उसे खेलना है और जीतना भी है, ताकि नौकरी मिल सके। लेकिन कदम-कदम पर भगवान उसके रास्ते में कांटें लिए खड़ा है।
कहानी एक साथ कई मोर्चों पर चलती है। खेल वाला पक्ष बेहतरीन है। एक छोटे शहर में बड़े सपने लिए बैठे किसी खिलाड़ी को कितनी और किस-किस तरह की बाधाओं से जूझना पड़ता है, फिल्म इसे विस्तार से दिखाती है। खेल-संघों में कब्जा जमाए बैठे दबंगों की करतूतें, सीमित साधनों के साथ अपने खिलड़ियों को अच्छी ट्रेनिंग दे रहे ईमानदार कोच, खिलाड़ियों की निजी जिंदगी, अपने ही परिवार से मिल रही दुत्कार, खेल-कोटे से नौकरी मिलने पर अफसरों का रवैया जैसी बातें फिल्म को प्रभावी बनाती हैं। वहीं प्रेम-कहानी वाला पक्ष साधारण है। लड़के-लड़की का प्यार और उसमें दुनिया भर की अड़चनें। सबसे बड़ी अड़चन वही खूसट चाचा जिससे लड़के का पंगा चल रहा है। उस चाचा को अपने ब्राह्मण होने का बड़ा दंभ है तो अगर लड़के को दलित दिखा देते तो मामला ज्यादा असरदार हो सकता था। तीसरा पक्ष है इस कहानी में जातिवाद, गौ-रक्षा, बीफ, भारत माता की जय जैसी उन बातों का होना जो मूल कहानी की जरूरत न होते हुए भी फिल्मकार के निजी एजेंडे की पूर्ति के लिए डाली गई लगती हैं। यह पक्ष फिल्मकार के अंध-भक्तों को लुभाएगा तो वहीं निष्पक्ष दर्शकों को अखरेगा।
इंटरवल तक की स्क्रिप्ट काफी मजबूत है। फिल्म देखते हुए लगातार यह उत्सुकता बनी रहती है कि अब कुछ धमाका होगा, अब लड़के पर गाज़ गिरेगी। लेकिन अंत में जब ये सब होता है तो लगता है कि बात डायरेक्टर के हाथ से फिसल गई। भगवान ने श्रवण के साथ बाद में जो किया, वह पहले भी तो कर सकता था। श्रवण ने भगवान से जो माफी मांगी, वह पहले भी तो मांग सकता था। हद से गुजर जाने के बाद आईं ये दोनों ही चीजें असर कम करती हैं। क्लाइमैक्स तो एकदम लुल्ल है। और जब अंत में निर्देशक को लिख कर समझाना पड़े कि जो हुआ वह क्यों हुआ तो सारा खेल ही खराब हो जाता है।
फिल्म के किरदार दिलचस्प हैं। बरेली और बनारस के रंग-ढंग में ढले इन किरदारों के लिए जिन कलाकारों को लिया गया वे एकदम विश्वसनीय लगते हैं। कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा लगातार उम्दा काम कर रहे हैं। हर किसी ने एक्टिंग भी ऐसी की है कि आप उसके असर से अछूते नहीं रह सकते। विनीत कुमार सिंह की ट्रेनिंग के दौरान की गई मेहनत दिखती है। गूंगी बनीं जोया हुसैन तो अपनी चमकती आंखों से बोलती हैं। ये दोनों ही इस साल का हासिल हैं। जिमी शेरगिल, रवि किशन, ‘नदिया के पार’ वाली साधना सिंह और बाकी सब भी बेहतरीन रहे हैं।
फिल्म का एक और मजबूत पक्ष इसके संवाद हैं। स्थानीय बोली में इस्तेमाल किए जाने वाले रोजमर्रा के शब्दों से बुने गए ये डायलाॅग खुद किसी जोरदार पंच से कम नहीं हैं। कैमरे की कारीगरी भी जानदार है। शुरूआती दृश्यों में हैंड-हैल्ड कैमरा का इस्तेमाल रामगोपाल वर्मा की शैली की याद दिलाता है। भीड़ भरी जगहों पर फिल्माए गए सीन प्रभावित करते हैं। अनुराग की फिल्मों में म्यूजिक की अपनी अलग जगह होती है जहां गाने गुनगुनाने के लिए नहीं बल्कि कहानी का असर बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होते हैं। फिल्म थोड़ी और छांटी जाती तो ज्यादा कसी हुई लगती। बरेली जैसे शहर में एक आदमी की दबंगई के सामने जेल, पुलिस और मीडिया की निष्क्रियता भी अखरती है।
इस फिल्म में असली वाले अनुराग अपने असर और शैली के साथ मौजूद हैं। लेकिन यह पूरी तरह से बेदाग भी नहीं है। थोड़ा और दिमागी डिटर्जेंट जरूरी था इसे चमकाने के लिए।
अपनी रेटिंग-तीन स्टार
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