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Saturday, 25 January 2020

रिव्यू-अरमानों से हल्का-सा ‘पंगा’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
कभी थी वो देश की कबड्डी टीम की कप्तान। आज उसके पास रेलवे की नौकरी है। पति भी रेलवे में इंजीनियर। एक प्यारा-सा बेटा। रेलवे का दिया घर। खुशहाल ज़िंदगी। क्या नहीं है उसके पास। लेकिन उसे तो ज़िंदगी से पंगा लेना है। बेटे के अरमान पूरे करने के लिए कबड्डी में वापस आई जया निगम को अब कबड्डी में अपनी भी खुशी दिखाई देने लगती है। लेकिन यह पंगा इतना आसान थोड़े ही है।

Friday, 13 September 2019

रिव्यू-मर्ज़ी और ज़बर्दस्ती की बात ‘सैक्शन 375’ में

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
फिल्म की यूनिट में काम करने वाली एक लड़की के साथ उसके डायरेक्टर ने रेप किया। आरोप साबित हुआ और डायरेक्टर को 10 साल की सज़ा हो गई। केस हाई-कोर्ट में पहुंचा तो धीरे-धीरे केस की परतें खुलने लगीं, कुछ दबी हुई बातें सामने आने लगीं और कुछ ढके हुए सच आकर सवाल पूछने लगे कि जो हुआ उसमें मर्ज़ी ज़्यादा थी या ज़बर्दस्ती...?

Sunday, 29 April 2018

रिव्यू-सरकार, यह ‘देव’ तो ‘दास’ निकला

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
चलो सरकार, फिल्म बनाते हैं। पर सरकारतो रामू बना चुके हैं। तो चलो उसमें हैमलेटमिलाते हैं। मगर उस पर विशाल भारद्वाज हैदरबना चुके हैं। तो फिर ऐसा करते हैं देवदासभी मिला देते हैं। हीरो का नाम देव, उसकी सखी का पारो रख देते हैं। थोड़ी-थोड़ी ओंकारा’, ‘मकबूल’, ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’, ‘राजनीति’, ‘हु तु तु’, ’सत्ताऔर ऐसे ही फ्लेवर वाली फिल्में भी ले लेते हैं। कुछ तो बन ही जाएगा।

तो साहब, यह जो कुछबन कर आया है इसमें बाहुबलियों वाला बैकग्राउंड है। राजनीतिक परिवार की कहानी है। सत्ता और पॉवर के नशे का मिक्सचर है। प्यार और धोखे का तड़का है। उठा-पटक है, गोलियां हैं, गालियां हैं। बस नहीं है तो वह सुधीर मिश्रा और उनका वाला टच जिसके शैदाई कभी हम जैसे लोग हुआ करते थे।

फिल्म की कहानी तो जो है सो है ही, इसकी स्क्रिप्ट इतनी ज्यादा जटिल और उलझी हुई है कि यकीन नहीं होता कि आप उन्हीं सुधीर मिश्रा की फिल्म देख रहे हैं जो डार्क कहानियों को भी इस सरलता से बयान कर दिया करते थे कि उनके निगेटिव किरदारों से भी इश्क-सा होने लगता था। इस कहानी के ढेरों किरदारों में से तो एक भी पात्र ऐसा नहीं निकला जो आपकी हमदर्दी ले जा सके।

एक्टिंग कई लोगों की जबर्दस्त है। सौरभ शुक्ला और विपिन शर्मा तो भरपूर छाए रहे। दिलीप ताहिल, अदिति राव हैदरी, ऋचा चड्ढा, विनीत कुमार सिंह भी उम्दा रहे। देव बने राहुल भट्ट हालांकि इस सारे मजमे में सबसे कमजोर रहे लेकिन अपनी तरफ से वह भी भरपूर कोशिशें करते नजर आए। अनुराग कश्यप भी हैं। बुल्ले शाह और फैज़ की रचनाएं लेने के बाद ढेरों गीतकारों-संगीतकारों की भीड़ से जो गाने तैयार करवाए गए वे भी इस फिल्म की तरह ही औसत रह गए।

यह फिल्म देखते हुए महसूस होता है कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री किस तरह से उन फिल्मकारों के जेहन में भी घिसे-पिटे रास्तों पर चलने और दूसरों से मुकाबला करने का दबाव बनाती है जो कभी अपनी राह खुद बनाया करते थे। अफसोस, कि सुधीर मिश्रा भी इस दबाव के सामने दास बन गए।
अपनी रेटिंग-डेढ़ स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)


Saturday, 9 December 2017

रिव्यू-पंचर कॉमेडी है ‘फुकरे रिटर्न्स’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
फुकरेलौट आए हैं। यूं तो पिछली फिल्म को आए करीब साढ़े चार साल बीत चुके हैं लेकिन फुकरे रिटर्न्सके अंदर कहानी सिर्फ एक साल आगे खिसकी है। भोली पंजाबन जुगत लड़ा कर जेल से बाहर गई है और आते ही उसने इन फुकरों की नाक में दम कर दिया है। चूचा को अब लॉटरी वाला सपना नहीं बल्कि भविष्य में होने वाली कोई घटना दिखाई देने लगी है। लेकिन इस बार ये लोग भोली को नहीं बल्कि नेता बाबू लाल भाटिया को पाठ पढ़ाने में लगे हैं।

चूचा के साथ हर बार कुछ कुछ अनोखा होता रहे और ये चारों किसी मुश्किल में पड़ कर निकलते रहें तो यकीन मानिए फुकरेसीरिज़ की फिल्में शानदार, यादगार हो सकती हैं। लेकिन अपनी इस दूसरी ही कोशिश में इसे लिखने और बनाने वाले जिस कदर चूक गए हैं, उससे इस सीरिज़ का भविष्य चाहे जैसा हो, वर्तमान तो धुंधला ही दिख रहा है। ठोक-पीट कर जबरन सीक्वेल बनाया जाए तो ऐसा ही होता है।

ऐसा नहीं है कि फिल्म एकदम ही खोखली है। 2013 में आई फुकरेअपने जिन तत्वों के दम पर हौले-हौले चलती हुई दर्शकों के दिलोदिमाग पर छा कर कामयाब कहलाई थी, वे सभी बातें उसके इस सीक्वेल में भी हैं। लेकिन दिक्कत यही है कि वैसी ही सारी बातें हैं, जो पिछली बार थीं और इस बार तो ये बातें फ्रेश लग रही हैं और दमदार। कहानी भी जबरन खिंची हुई लगती है।

चूचा के साथ हुई अनोखी घटना फिल्म शुरू होने के एक घंटे बाद सामने आती है। तब तक यह आपको इधर-उधर गलियों में घुमाती रहती है। और इसके बाद भी इसने कोई हाईवे नहीं पकड़ा है। ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर लड़खड़ाती हुई यह आपको बराबर झटके देती है और अहसास कराती है कि इस कहानी का इंजन पुराना पड़ा चुका है, टायर घिस चुके हैं, भले ही ऊपर से रंग-रोगन शानदार किया गया हो। अरे, सिर्फ गैग्स और पंचेस पर ही हंसना हो तो टी.वी. के पकाऊ काॅमेडी शोज़ बुरे हैं क्या?

एक बड़ी कमी यह भी रही कि इस बार कहानी में सारे किरदारों को विस्तार नहीं दिया गया। पुलकित सम्राट इस बार केंद्र में दिखे ही नहीं। मनजोत सिंह, अली फ़ज़ल, विशाखा सिंह, प्रिया आनंद वगैरह की जरूरत ही महसूस नहीं करवाई गई। यहां तक कि पंडित जी और भोली पंजाबन का किरदार भी हल्का ही रहा। वो तो पंकज त्रिपाठी और ऋचा चड्ढा काबिल कलाकार हैं जो अपनी कोशिशों से अपने किरदारों को ऊपर ले गए। हां, नेता बाबू लाल का रोल इस बार काफी बड़ा रहा और राजीव गुप्ता ने उसे सधे हुए ढंग से निभाया भी। चूचा बने वरुण अपनी सीमित अदाओं के बावजूद पर्दे पर जब-जब दिखे, अच्छे लगे। अगर वह हास्य-श्रेणी में कोई अवार्ड भी ले उड़ें तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

बीफ, स्वैग, येल यूनिवर्सिटी, व्हाट्सऐप, कॉमनवैल्थ घोटाला वगैरह पर कमैंट करके फिल्म मौजूं होने का अहसास भले ही कराए लेकिन इसकी जरूरत से ज्यादा और जबरन खींची गई स्क्रिप्ट के साथ-साथ कॉमेडी उपजाने के लिए इस्तेमाल किए गए घिसे-पिटे तीर-तुक्के इसे एक औसत फिल्म का दर्जा ही देते हैं। इस बार तो म्यूजिक भी कमजोर रहा।

अगर इन फुकरों ने इसी तरह अधकचरे अंदाज में ही आना है तो बेहतर होगा कि इनसे कहा जाए-भैया, तुम यहीं से रिटर्न हो लो। तुम अपने घर में खुश रहो और हम अपने घर में पिछली वाली फुकरेदेख कर खुश हो लेंगे।
अपनी रेटिंग-दो स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)