एक्शन और रोमांच से भरी एक ऐसी वेब-सीरिज़ जिसका मुख्य नायक एक सीक्रेट एजेंट हो और देश को बचाने के लिए जान हथेली पर लिए घूमता हो,
उस सीरिज़ का नाम ‘फैमिली मैन’...?
किसने सोचा होगा यह नाम?
और क्यों?
लेकिन इस सीरिज़ को देख चुके लोग जानते हैं कि श्रीकांत तिवारी नाम का यह नायक असल में कितना मजबूर फैमिली-मैन है जो एक तरफ अपने फर्ज़ और दूसरी तरफ अपनी फैमिली के प्रति ज़िम्मेदारियों के बीच इस कदर फंसा हुआ है कि उस पर तरस आता है। उसकी पत्नी उससे खुश नहीं है,
बेटी हाथ से निकली जा रही है,
लेकिन वह है कि देश और ड्यूटी के प्रति अपने जुनून में कमी नहीं आने देता। यह सीरिज़ दरअसल ऐसे ही जुनूनियों की कहानी है जो सामने न आकर हर दिन,
हर पल देश के लिए कहीं खड़े हैं,
किसी न किसी रूप में। एक जगह एजेंट जे.के. कहता भी है-‘करते नेता हैं और मरते हम हैं।’ तो श्रीकांत का जवाब होता है-‘हम किसी नेता के लिए नहीं,
उसके पद और उस पद की प्रतिष्ठा के लिए अपनी जान दांव पर लगाते हैं।’
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Thursday, 10 June 2021
वेब रिव्यू-रोमांच की आंच में तप कर निकला ‘फैमिली मैन 2’
Tuesday, 18 August 2020
रिव्यू-उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी ‘खुदा हाफिज़’
विद्युत जामवाल किसी फिल्म के हीरो हों तो उसमें कमांडो स्टाइल का एक्शन ही होगा। इसे कोई सीधी-सी फिल्म में क्यों नहीं लेता? लीजिए,
ले लिया इसे ‘सीधी-सी’ फिल्म में। दे दिया इसे ‘सीधा-सा’ रोल। पर क्या यह बंदा इस फिल्म और अपने रोल के साथ न्याय कर पाया? और उससे भी ज़रूरी बात, कि क्या यह फिल्म इस बंदे के साथ न्याय कर पाई?
आइए,
पहले कहानी का मुआइना कर लें।Sunday, 29 April 2018
रिव्यू-सरकार, यह ‘देव’ तो ‘दास’ निकला
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
चलो सरकार, फिल्म बनाते हैं। पर ‘सरकार’ तो रामू बना चुके हैं। तो चलो
उसमें ‘हैमलेट’ मिलाते हैं। मगर उस पर विशाल भारद्वाज
‘हैदर’ बना चुके हैं। तो फिर ऐसा करते
हैं ‘देवदास’ भी मिला देते हैं। हीरो का नाम
देव, उसकी सखी का पारो रख देते हैं।
थोड़ी-थोड़ी ‘ओंकारा’, ‘मकबूल’, ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’, ‘राजनीति’, ‘हु तु तु’, ’सत्ता’ और ऐसे ही फ्लेवर वाली फिल्में
भी ले लेते हैं। कुछ तो बन ही जाएगा।
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार
हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय।
मिजाज से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित
लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)
चलो सरकार, फिल्म बनाते हैं। पर ‘सरकार’ तो रामू बना चुके हैं। तो चलो
उसमें ‘हैमलेट’ मिलाते हैं। मगर उस पर विशाल भारद्वाज
‘हैदर’ बना चुके हैं। तो फिर ऐसा करते
हैं ‘देवदास’ भी मिला देते हैं। हीरो का नाम
देव, उसकी सखी का पारो रख देते हैं।
थोड़ी-थोड़ी ‘ओंकारा’, ‘मकबूल’, ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’, ‘राजनीति’, ‘हु तु तु’, ’सत्ता’ और ऐसे ही फ्लेवर वाली फिल्में
भी ले लेते हैं। कुछ तो बन ही जाएगा।
तो साहब, यह जो ‘कुछ’ बन कर आया है इसमें बाहुबलियों
वाला बैकग्राउंड है। राजनीतिक परिवार की कहानी है। सत्ता और पॉवर के नशे का मिक्सचर
है। प्यार और धोखे का तड़का है। उठा-पटक है, गोलियां हैं, गालियां हैं। बस नहीं है तो वह
सुधीर मिश्रा और उनका वाला टच जिसके शैदाई कभी हम जैसे लोग हुआ करते थे।
फिल्म की कहानी तो जो है सो है ही, इसकी स्क्रिप्ट इतनी ज्यादा जटिल और उलझी हुई है कि यकीन नहीं होता कि आप उन्हीं
सुधीर मिश्रा की फिल्म देख रहे हैं जो डार्क कहानियों को भी इस सरलता से बयान कर दिया
करते थे कि उनके निगेटिव किरदारों से भी इश्क-सा होने लगता था। इस कहानी के ढेरों किरदारों
में से तो एक भी पात्र ऐसा नहीं निकला जो आपकी हमदर्दी ले जा सके।
एक्टिंग कई लोगों की जबर्दस्त है। सौरभ शुक्ला और विपिन शर्मा तो भरपूर छाए रहे।
दिलीप ताहिल, अदिति राव हैदरी, ऋचा चड्ढा, विनीत कुमार सिंह भी उम्दा रहे।
देव बने राहुल भट्ट हालांकि इस सारे मजमे में सबसे कमजोर रहे लेकिन अपनी तरफ से वह
भी भरपूर कोशिशें करते नजर आए। अनुराग कश्यप भी हैं। बुल्ले शाह और फैज़ की रचनाएं लेने
के बाद ढेरों गीतकारों-संगीतकारों की भीड़ से जो गाने तैयार करवाए गए वे भी इस फिल्म
की तरह ही औसत रह गए।
यह फिल्म देखते हुए महसूस होता है कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री किस तरह से उन फिल्मकारों
के जेहन में भी घिसे-पिटे रास्तों पर चलने और दूसरों से मुकाबला करने का दबाव बनाती
है जो कभी अपनी राह खुद बनाया करते थे। अफसोस, कि सुधीर मिश्रा भी इस दबाव के सामने दास बन गए।
अपनी रेटिंग-डेढ़ स्टार
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