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Thursday, 19 August 2021

रिव्यू-कसा हुआ है यह बेबी ‘बेलबॉटम’

-दीपक दुआ...  (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
पहले इसी फिल्म से एक दुख भरी दास्तान सुनिए-‘‘एक बार एक नवजात कुत्ते ने अपनी मां से पूछा कि पिताजी कैसे दिखते थे? इस पर मां ने मायूसी से कहा-पता नहीं बेटा, एक दिन वह पीछे से आए और चुपचाप पीछे से ही चले गए। रॉ (भारत की खुफिया एजेंसी) वही पिताजी है।’’
 
यह सही है कि दुनिया की तमाम खुफिया एजेंसियों की तरह अपनी रॉ भी देश-दुनिया में बहुत कुछ ऐसा करती है जो या तो तुरंत सामने नहीं आता या फिर उसमें रॉ और उसके एजेंटों का ज़िक्र नहीं होता। हमारी फिल्मों ने गाहे-बगाहे हमारे इन जासूसों के कारनामें पर्दे पर उतारे हैं। यह फिल्म भी उसी दिशा में एक कोशिश है-अच्छी, कसी हुई, मनोरंजक।

Thursday, 26 December 2019

रिव्यू-मुबारक हो, ‘गुड न्यूज़’ है

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
वरुण बत्रा-दीप्ति बत्रा। पति-पत्नी। बरसों की कोशिश के बाद भी ये दोनों मां-बाप नहीं बन पा रहे थे तो ये लोग पहुंचे डॉ. जोशी के आई.वी.एफ. क्लिनिक में ताकि कृत्रिम गर्भाधान करवा सकें। लेकिन एक गड़बड़ हो गई। वहां चंडीगढ़ से हनी बत्रा-मोनिका बत्रा भी इसी काम से आए हुए थे और क्लिनिक वालों की गलती से वरुण बत्रा के स्पर्म मोनिका की कोख में और हनी बत्रा के दीप्ति की कोख में जा पहुंचे। अब क्या किया जाए?

Saturday, 22 June 2019

रिव्यू-‘कबीर सिंह’-थोथा चना बाजे घना

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
कहानी-एक ही कॉलेज में पढ़ने वाले लड़के-लड़की में प्यार हो गया। लड़की के बाप को इनका रिश्ता पसंद नहीं। लड़की की शादी कहीं और करवा दी गई। लड़के ने खुद को शराब में डुबो लिया। फिर कुछ हुआ और लड़का सुधर गया।

देखा जाए तो कबीर सिंहकी कहानी बस इतनी ही है। लेकिन इस कहानी के चारों तरफ बहुत कुछ लपेटा गया है। इसके किरदारों के चारों तरफ भी कुछ आवरण हैं जो इसे बीते कुछ सालों में आई फिल्मों से हट करबनाते हैं। लेकिन यह हट करक्या सचमुच घिसी-पिटी लीक को तोड़ता है या फिर सिर्फ हटनेके लिए हटा गया है ताकि लोगों को इस झांसे में लेकर अपना माल बेचा जा सके कि देखिए, यह हट करवाला माल है?

Thursday, 17 January 2019

रिव्यू-‘बॉम्बेरिया’... बेवकूफेरिया... बर्बादेरिया...

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
इस रिव्यू की ऊल-जलूल हैडिंग पढ़ कर आप अगर सोच रहे हैं कि यह क्या बला है, तो बता दें कि यह फिल्म यानी बॉम्बेरियाभी ऐसी ही है-ऊल-जलूल, बिना सिर-पैर की, बेमतलब, बेमायने, बेवकूफाना, बर्बादाना...!

Wednesday, 23 May 2018

रिव्यू-अहसान उतारती है ‘बायोस्कोपवाला’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
टैगोर की अमर कहानी काबुलीवालाबताती है कि अफगानिस्तान से आया पठान (काबुलीवाला) कलकत्ते की गलियों में मेवे बेचता है, पैसे उधार देता है, छोटी-सी मिनी में अपनी बेटी की झलक देखता है, अपने मुल्क लौटना चाहता है, किसी को चाकू मार कर जेल चला जाता है, लौटता है तो पाता है कि मिनी की शादी हो रही है।

बायोस्कोपवालाउसी कहानी को नई नज़र से देखती है, नए सिरे से उठाती है और एक नया अंत दिखाती है। पठान को अफगानिस्तान से कोलकाता क्यों आना पड़ा? मिनी में उसे अपनी बेटी क्यों दिखाई देती है? अफगानिस्तान में वह क्या करता था? यहां वह मेवे बेचने की बजाय गलियों में घूम-घूम कर छोटे-से डिब्बे में बायोस्कोप क्यों दिखाता है। उसके जेल जाने के पीछे की सही वजह क्या थी? अब उसकी कैसी हालत है? इतने बरसों बाद मिनी उसे किस नज़र से देखती है? पहचानती भी है या नहीं? पहचान जाती है तो वह उसके लि क्या करती है? और मिनी जो करती है, वह सच जब सामने आता है तो यकीन मानिए आंखें नम हो उठती हैं।