एक्शन और रोमांच से भरी एक ऐसी वेब-सीरिज़ जिसका मुख्य नायक एक सीक्रेट एजेंट हो और देश को बचाने के लिए जान हथेली पर लिए घूमता हो,
उस सीरिज़ का नाम ‘फैमिली मैन’...?
किसने सोचा होगा यह नाम?
और क्यों?
लेकिन इस सीरिज़ को देख चुके लोग जानते हैं कि श्रीकांत तिवारी नाम का यह नायक असल में कितना मजबूर फैमिली-मैन है जो एक तरफ अपने फर्ज़ और दूसरी तरफ अपनी फैमिली के प्रति ज़िम्मेदारियों के बीच इस कदर फंसा हुआ है कि उस पर तरस आता है। उसकी पत्नी उससे खुश नहीं है,
बेटी हाथ से निकली जा रही है,
लेकिन वह है कि देश और ड्यूटी के प्रति अपने जुनून में कमी नहीं आने देता। यह सीरिज़ दरअसल ऐसे ही जुनूनियों की कहानी है जो सामने न आकर हर दिन,
हर पल देश के लिए कहीं खड़े हैं,
किसी न किसी रूप में। एक जगह एजेंट जे.के. कहता भी है-‘करते नेता हैं और मरते हम हैं।’ तो श्रीकांत का जवाब होता है-‘हम किसी नेता के लिए नहीं,
उसके पद और उस पद की प्रतिष्ठा के लिए अपनी जान दांव पर लगाते हैं।’
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Thursday, 10 June 2021
वेब रिव्यू-रोमांच की आंच में तप कर निकला ‘फैमिली मैन 2’
Sunday, 2 September 2018
रिव्यू-सामाजिक सलवटों को इस्त्री करती ‘स्त्री’
साल में चार दिन उस कस्बे में पूजा होती है। इन्हीं चार दिनों में आती है एक भूतनी। जिस घर के बाहर ‘ओ स्त्री कल आना’ लिखा होता है,
उसमें नहीं जाती। वरना रातों को मर्द उठा कर ले जाती है वह। सिर्फ मर्द, उनके कपड़े नहीं। कहते हैं कि ये भूतनी मर्दों की प्यासी है। जो उसकी आवाज़ पर पलटा,
वह गायब। इसी कस्बे के तीन दोस्तों में से एक से पूजा के दिनों में मिलती है एक अनजान लड़की। न कोई नाम,
न नंबर। अचानक आती है,
अचानक गायब हो जाती है। कहीं यह लड़की ही वह ‘स्त्री’ तो नहीं...?
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