Monday, 11 November 2019

क्या ‘गली बॉय’ ऑस्कर ला पाएगा...!

-दीपक दुआ...
गली बॉयऑस्कर के लिए क्या भेजी गई कि हर साल की तरह आरोप-प्रत्यारोप और विलाप-प्रलाप का  सिलसिला शुरू हो गया। किसी को लगता है कि यह ऑस्कर के लिहाज से बेहद कमजोर फिल्म है तो किसी का कहना है कि इसे भेजे जाने में भाई-भतीजावाद का हाथ है। हालांकि इस तरह की बातें तो अब नई रह गई हैं और ही अनोखी। हर साल ऑस्कर में भेजी जाने वाली फिल्म के समर्थन और मुखालफत में फिल्मी और आम लोग खड़े होते हैं। लेकिन गौर करें तो गली बॉयमें वह सब कुछ है जो ऑस्कर के लिए फिल्म भेजे जाते समय और बाद में ऑस्कर देने के लिए फिल्म चुनते समय देखा जाता है। आइए, ऑस्कर को जरा करीब से जानते हैं।

Thursday, 24 October 2019

रिव्यू-‘मेड इन चाइना’-चाईनीज़ शफाखाने का चिंदी चूरण

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
चीन से सरकारी दौरे पर गुजरात आया एक अफसर यहां का एक सूप पीकर मर जाता है। सी.बी.आई. के लोग सूप बेचने वाले डॉक्टर (बोमन ईरानी) और उसे बनाने वाले रघु (राजकुमार राव) तक पहुंचते हैं। आरोप लगता है कि इस सूप में चीन से मंगवाए गए बाघ के शरीर के हिस्से हैं। तब रघु उन्हें पूरी कहानी बताता है कि कैसे हर धंधे में नाकाम होने के बाद उसने इस मैजिक सूपका कारोबार शुरू किया जिससे मर्दों की पॉवर’ बढ़ती है। कैसे उसने इस काम में डॉक्टर और बाकी लोगों को जोड़ा। कैसे इन लोगों ने आम जनता में फैली भ्रांतियों को दूर करने का काम किया, वगैरह-वगैरह। पर क्या सचमुच इस सूप में कुछ आपत्तिजनक था? क्या सचमुच वह अफसर इस सूप की वजह से ही मरा? और क्या सच में यह सूप वायग्रा से कई गुना ज़्यादा ताकतवर है?

Wednesday, 23 October 2019

रिव्यू-बदलती हवा का रुख बतलाती ‘सांड की आंख’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पिछली सदी के आखिरी दिनों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गांव में साठ की उम्र पार कर चुकीं दो दादियों ने निशानेबाजी शुरू की और देखते ही देखते ढेरों राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुकाबले जीत कर पदकों का ढेर लगा दिया और दुनिया भर में शूटर-दादी के नाम से मशहूर हुईं। पर क्या इनका यह सफर इतना आसान रहा होगा? पूरी ज़िंदगी घूंघट के अंदर काटने और हर किसी की चाकरी करने के बाद समाज के पितृसत्तात्मक रवैये के सामने उठ खड़े होने की हिम्मत कहां से आई होगी इनके भीतर? कैसे इन्होंने उन तमाम बाधाओं को लांघा होगा जो इनकी राह में कभी पति, कभी बेटे, कभी समाज के तानों, कभी परंपराओं की बेड़ियों के रूप में सामने आई होंगी। यह फिल्म इनके इसी सफर को, इस सफर के दौरान किए गए संघर्ष को दिखाती है और बड़े ही कायदे से दिखाती है।

Thursday, 17 October 2019

रिव्यू-या रब, यह कैसी फिल्म बना दी ’#यारम’...!

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
सिद्धांत कपूर--पप्पा, मेरे लिए कोई पिक्चर बनाओ न। देखो , श्रद्धा कितनी बड़ी स्टार बन गई जबकि मुझे कोई जानता तक नहीं।
शक्ति कपूर--अबे ढाक की चिकी, पिच्चर तो मैंने श्रद्धा के लिए भी नहीं बनाई, वो भी तो खुद ही चली है, तू भी चल ले।
सिद्धांत--पप्पा, मुझे कुछ नहीं पता। या तो आप मेरे लिए पिक्चर बनाओ वरना मैं मम्मी को बता दूंगा कि आप कहां-कहां आं-ऊं करते रहते हो।
शक्ति--धमकी दे रा है, तेरी तो...*@#$... चल बनवाते हैं किसी से। पकड़ते हैं किसी ऐसे को जिसे तेरे एक्टिंग के टेलेंटके बारे में पता हो वरना तुझे लेकर कौन फिल्म बनाएगा। शूटिंग भी पूरी बाहर जाकर करेंगे और इसी बहाने थोड़ा-बौत आं-ऊं भी कर आएंगे।