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Sunday, 14 March 2021

वेब-रिव्यू : सपनों के शहर में जूझतीं ‘बॉम्बे बेगम्स’

-प्रियंका ओम... (Featured in IMDb Critics Reviews)
नाम ही काफी था अपने पास खींच कर बिठा लेने के लिए।लिपस्टिक अंडर माई बुर्कावाली डायरेक्टर अलंकृता श्रीवास्तव की बनाई और नेटफ्लिक्स पर आई इस सीरिज़बॉम्बे बेगम्सकी कहानीस्त्री संचालितअपने नाम से ही मुखर थी, फिर पूजा भट्ट और शाहाना गोस्वामी का जुड़ाव इसे और सुस्पष्ट करता है। रिव्यू की शुरुआत खुद की ही कहानीइमोशनके एक संभाषण से करना चाहूंगी जहां एक स्वांत सुखाय बनी कॉल-गर्ल कॉर्पोरेट में काम करने वाली स्त्रियों के मुत्तालिक कहती है, “पैसा, पॉवर और प्रमोशन ऐसी बहुत-सी जिजीविषाएं हैं जिनके लिए उन्हें अपनी आत्मा को मारना पड़ता है और ज़िंदगी भर ढोते हैं सिर्फ शरीर...’’ और कहानी के अंत में वह यह भी कहती है, ‘‘मैं उनसे बेहतर हूं।’’
 

Sunday, 14 June 2020

रिव्यू-जब कहानी ‘चोक्ड’ हो और कुछ न बोले

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
मुंबई। पति बेरोज़गार संगीतकार। गाना छोड़ चुकी पत्नी बैंक की नौकरी से घर चला रही है। एक बच्चा। हालत तंग, आमदनी सीमित, प्यार गायब। किचन की नाली बार-बार चोक हो जाती है। एक रात उस नाली में से नोटों के बंडल निकलते हैं। अगली रात फिर। पत्नी खुश। पर कुछ ही दिन में सरकार नोटबंदी लागू कर देती है। पुराने नोट अब नहीं चलेंगे। अब क्या हो? किस के हैं ये नोट? क्या होगा लोगों का, नोटों का, इस परिवार का?

Monday, 11 November 2019

क्या ‘गली बॉय’ ऑस्कर ला पाएगा...!

-दीपक दुआ...
गली बॉयऑस्कर के लिए क्या भेजी गई कि हर साल की तरह आरोप-प्रत्यारोप और विलाप-प्रलाप का  सिलसिला शुरू हो गया। किसी को लगता है कि यह ऑस्कर के लिहाज से बेहद कमजोर फिल्म है तो किसी का कहना है कि इसे भेजे जाने में भाई-भतीजावाद का हाथ है। हालांकि इस तरह की बातें तो अब नई रह गई हैं और ही अनोखी। हर साल ऑस्कर में भेजी जाने वाली फिल्म के समर्थन और मुखालफत में फिल्मी और आम लोग खड़े होते हैं। लेकिन गौर करें तो गली बॉयमें वह सब कुछ है जो ऑस्कर के लिए फिल्म भेजे जाते समय और बाद में ऑस्कर देने के लिए फिल्म चुनते समय देखा जाता है। आइए, ऑस्कर को जरा करीब से जानते हैं।

Monday, 24 June 2019

ओल्ड रिव्यू-रमन राघव-न काला न सफेद

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
मुबारक हो, अनुराग कश्यप लौट आए हैं। वही अनुराग जो जिंदगी के, इंसानी मन के और समाज के अंधेरे कोनों को दिखाने में महारथ रखते हैं।
एक साइको किलर। किसी को भी किसी भी वजह से या बेवजह मारने वाला।
एक पुलिस अफसर। नशेड़ी। कभी भी किसी को भी मारने वाला।
क्या फर्क है दोनों में? एक अपराधी है और दूसरा मकसद से मार रहा है? नहीं। यहां अपराधी और पुलिस का फर्क नहीं है। पहला खुलेआम मार रहा है, दूसरा वर्दी की आड़ में। पहले को दूसरे की तलाश है और दूसरे को पहले की। पर क्यों?

Thursday, 14 February 2019

रिव्यू-‘गली बॉय’-ब्राउन एंड ब्यूटीफुल

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
मुंबई 17, बोले तो धारावी का इलाका। झोंपड़पट्टी, कचरापट्टी, गुज़रने को तंग गलियां, रहने को तंग खोलियां, तंग सोच, तंग दिल। लेकिन यहां रहने वाले मुराद को उठना है, उड़ना है क्योंकि उसे लगता है कि अपना टाइम आएगा। रैप लिखते-लिखते वह गाने भी लगता है। हालांकि उसके मामा का मानना है कि नौकर का बेटा नौकर ईच बनेगा, यही फितरत है। मामी कहती है कि गाना ही है तो ग़ज़ल गा लो। उसका ड्राईवर बाप भी कहता है कि सपने वो देखो जो तुम्हारी असलियत से मैच करते हों। पर मुराद का कहना है कि वह अपनी असलियत बदलेगा ताकि वो उसके सपनों से मैच कर सके।