बच्चे गोद लेने चाहिएं या नहीं? और लेने के बाद अगर अपने बच्चे हो जाएं तो क्या उन्हें वापस छोड़ आना चाहिए? यह फिल्म इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूमती एक परिवार की ज़िंदगी को दिखाती है। जी हां, है तो यह पौने दो घंटे की एक फिल्म ही लेकिन थिएटर बंद हैं सो इसे डिज़्नी हॉटस्टार पर रिलीज़ किया गया है और फिल्मों की हालत इन दिनों मंद है सो इसे छोटे-छोटे 13 एपिसोड में काट कर बांटा गया है।
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Saturday, 22 May 2021
Tuesday, 30 March 2021
रिव्यू-थोड़ी हाई थोड़ी फ्लैट ‘पगलैट’
लखनऊ की संध्या
का पति आस्तिक
शादी के पांच
महीने में ही
मर गया। कल
ही उसकी अंत्येष्टि
हुई है। लेकिन
संध्या को न
तो रोना आ
रहा है और
भूख भी जम
कर लग रही
है। उसे चाय
नहीं पेप्सी पीनी
है, गोलगप्पे खाने है।
अगले 13 दिन तक
घर में जमा
किस्म-किस्म के
लोगों की सोच
और नज़रों से
निबटना है। कुछ
पुराने हिसाब चुकता
करने है। कुछ
नए फैसले लेने
है। कुछ चीज़ों
पर मिट्टी डालनी
है तो कुछ
नए बीज भी
बोने हैं।
Monday, 11 November 2019
क्या ‘गली बॉय’ ऑस्कर ला पाएगा...!
-दीपक दुआ...
‘गली बॉय’ ऑस्कर के लिए क्या भेजी गई कि हर साल की तरह आरोप-प्रत्यारोप और विलाप-प्रलाप का सिलसिला शुरू हो गया। किसी को लगता है कि यह ऑस्कर के लिहाज से बेहद कमजोर फिल्म है तो किसी का कहना है कि इसे भेजे जाने में भाई-भतीजावाद का हाथ है। हालांकि इस तरह की बातें न तो अब नई रह गई हैं और न ही अनोखी। हर साल ऑस्कर में भेजी जाने वाली फिल्म के समर्थन और मुखालफत में फिल्मी और आम लोग आ खड़े होते हैं। लेकिन गौर करें तो ‘गली बॉय’ में वह सब कुछ है जो ऑस्कर के लिए फिल्म भेजे जाते समय और बाद में ऑस्कर देने के लिए फिल्म चुनते समय देखा जाता है। आइए, ऑस्कर को जरा करीब से जानते हैं।
‘गली बॉय’ ऑस्कर के लिए क्या भेजी गई कि हर साल की तरह आरोप-प्रत्यारोप और विलाप-प्रलाप का सिलसिला शुरू हो गया। किसी को लगता है कि यह ऑस्कर के लिहाज से बेहद कमजोर फिल्म है तो किसी का कहना है कि इसे भेजे जाने में भाई-भतीजावाद का हाथ है। हालांकि इस तरह की बातें न तो अब नई रह गई हैं और न ही अनोखी। हर साल ऑस्कर में भेजी जाने वाली फिल्म के समर्थन और मुखालफत में फिल्मी और आम लोग आ खड़े होते हैं। लेकिन गौर करें तो ‘गली बॉय’ में वह सब कुछ है जो ऑस्कर के लिए फिल्म भेजे जाते समय और बाद में ऑस्कर देने के लिए फिल्म चुनते समय देखा जाता है। आइए, ऑस्कर को जरा करीब से जानते हैं।Thursday, 14 February 2019
रिव्यू-‘गली बॉय’-ब्राउन एंड ब्यूटीफुल
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
मुंबई 17, बोले तो धारावी का इलाका। झोंपड़पट्टी, कचरापट्टी, गुज़रने को तंग गलियां, रहने को तंग खोलियां,
तंग सोच, तंग दिल। लेकिन यहां रहने वाले मुराद को उठना है, उड़ना है क्योंकि उसे लगता है कि अपना टाइम आएगा। रैप लिखते-लिखते वह गाने भी लगता है। हालांकि उसके मामा का मानना है कि नौकर का बेटा नौकर ईच बनेगा, यही फितरत है। मामी कहती है कि गाना ही है तो ग़ज़ल गा लो। उसका ड्राईवर बाप भी कहता है कि सपने वो देखो जो तुम्हारी असलियत से मैच करते हों। पर मुराद का कहना है कि वह अपनी असलियत बदलेगा ताकि वो उसके सपनों से मैच कर सके।
Thursday, 18 October 2018
रिव्यू-‘बधाई हो’, बढ़िया फिल्म हुई है...!
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
दिल्ली का मध्यवर्गीय खुशहाल परिवार। पिता रेलवे में,
मां घर में। बड़ा बेटा नौकरी में,
छोटा बारहवीं में। दादी खटिया पर। तभी पता चला कि घर में एक नन्हा मेहमान आने वाला है। मां,
फिर से मां बनने वाली है। भूचाल आ गया जी। बेटों ने मां-बाप से मुंह मोड़ लिया, दादी ने बेटे-बहू से। परिवार, मौहल्ले, बिरादरी, समाज में छिछालेदार होने लगी, सो अलग। लेकिन अंत भला,
तो सब भला।
दिल्ली का मध्यवर्गीय खुशहाल परिवार। पिता रेलवे में,
मां घर में। बड़ा बेटा नौकरी में,
छोटा बारहवीं में। दादी खटिया पर। तभी पता चला कि घर में एक नन्हा मेहमान आने वाला है। मां,
फिर से मां बनने वाली है। भूचाल आ गया जी। बेटों ने मां-बाप से मुंह मोड़ लिया, दादी ने बेटे-बहू से। परिवार, मौहल्ले, बिरादरी, समाज में छिछालेदार होने लगी, सो अलग। लेकिन अंत भला,
तो सब भला।
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