Wednesday, 16 June 2021

रिव्यू-हिम्मत, लगन और जुनून की कहानी है ‘साइना’

 -गति उपाध्याय... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
किसी खिलाड़ी के नाम में अगर कई फर्स्ट जुड़े हों और वो खिलाड़ी महिला भी हो तो उस पर बायोपिक बनाना सिनेमा की ही नहीं, देश की भी ज़रूरत होती है। भारत में सबसे ज़्यादा आउटडोर खेला जाने वाला इनडोर गेम है बैडमिंटन। इससे भी ज़्यादा हैरानी की बात यह है कि एक अरब होने के पहले तक देश में इस लोकप्रिय खेल में सिर्फ एक सितारा था-प्रकाश पादुकोण, बाद में पुलेला गोपीचंद, बस। अमोल गुप्ते की यह फिल्म इसलिए भी ज़रूरी थी कि हाथ में शटल उठा चुके तमाम युवा और बच्चे यह जान सकें कि-
 “शहज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल ए बर्क,
 वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले“
 

Monday, 14 June 2021

ओल्ड रिव्यू-‘अंकुर अरोड़ा मर्डर केस’-सीरियस है मगर बोर नहीं

‘डॉक्टरी सिर्फ एक पेशा ही नहीं बिजनेस भी है...।’ विक्रम भट्ट के बैनर से आई इस फिल्म में डॉक्टर अस्थाना बने के.के. मैनन का यह संवाद न सिर्फ इस फिल्म की बल्कि दुनिया के सबसे पवित्र माने जाने वाले डॉक्टरी के पेशे की सच्चाई को भी सामने लाता है। अस्पतालों में इंसानी लापरवाही से किसी मरीज की मौत होना कोई नई और अनोखी बात नहीं है। अक्सर ऐसे मामले अदालतों तक भी पहुंचते हैं लेकिन आमतौर पर हो कुछ नहीं पाता। लेकिन इस फिल्म में सच की जीत होती है और गुनहगार को सज़ा भी मिलती है।
 

Friday, 11 June 2021

रिव्यू-खोखली फिल्म है ‘शादीस्थान’

मुंबई से अजमेर एक शादी में जा रहे परिवार की फ्लाइट छूट गई तो मजबूरन उन्हें एक म्यूज़िक बैंड के साथ उनकी बस में जाना पड़ा। यह परिवार अपनी इकलौती 18 बरस की लड़की की जबरन शादी करने पर तुला है जबकि लड़की राज़ी नहीं है। उधर इस बैंड की लड़की आज़ाद ख्याल है, सिगरेट-शराब पीती है, अपनी मर्ज़ी से जीती है। वह लड़की की मां को समझाती है कि इतनी जल्दी क्या है बेटी को खूंटे से बांधने की। मां-बाप आखिर मान भी जाते हैं, लेकिन कैसे?
 

Thursday, 10 June 2021

वेब रिव्यू-रोमांच की आंच में तप कर निकला ‘फैमिली मैन 2’

एक्शन और रोमांच से भरी एक ऐसी वेब-सीरिज़ जिसका मुख्य नायक एक सीक्रेट एजेंट हो और देश को बचाने के लिए जान हथेली पर लिए घूमता हो, उस सीरिज़ का नाम ‘फैमिली मैन’...? किसने सोचा होगा यह नाम? और क्यों? लेकिन इस सीरिज़ को देख चुके लोग जानते हैं कि श्रीकांत तिवारी नाम का यह नायक असल में कितना मजबूर फैमिली-मैन है जो एक तरफ अपने फर्ज़ और दूसरी तरफ अपनी फैमिली के प्रति ज़िम्मेदारियों के बीच इस कदर फंसा हुआ है कि उस पर तरस आता है। उसकी पत्नी उससे खुश नहीं है, बेटी हाथ से निकली जा रही है, लेकिन वह है कि देश और ड्यूटी के प्रति अपने जुनून में कमी नहीं आने देता। यह सीरिज़ दरअसल ऐसे ही जुनूनियों की कहानी है जो सामने न आकर हर दिन, हर पल देश के लिए कहीं खड़े हैं, किसी न किसी रूप में। एक जगह एजेंट जे.के. कहता भी है-‘करते नेता हैं और मरते हम हैं।’ तो श्रीकांत का जवाब होता है-‘हम किसी नेता के लिए नहीं, उसके पद और उस पद की प्रतिष्ठा के लिए अपनी जान दांव पर लगाते हैं।’