-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
‘पिता-वह मूर्ख प्राणी जो अपने बच्चों की खुशी के लिए किसी भी हद तक जा सकता है’ की टैगलाइन के साथ शुरू होने वाली यह फिल्म राजस्थान के उदयपुर की तारिका बंसल की लंदन के एक मशहूर और महंगे कॉलेज में पढ़ने की ख्वाहिश को पूरा करने की उसके पिता चंपक बंसल की कोशिशों और संघर्ष को दिखाती है। अपना सब कुछ दांव पर लगा कर भी चंपक अपनी बेटी के सपने को पूरा करने में जुटा रहता है। उसे लगता है कि अपनी पत्नी के आगे पढ़ने का सपना न पूरा करके उसके जो गुनाह किया है, अपनी बेटी की इच्छा पूरी करके वह उसका प्रायश्चित कर सकेगा।
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
फ्रैंच शॉर्ट-फिल्म ‘द पियानो ट्यूनर' में एक अंधा पियानो वादक बताता है कि शाहजहां ने ताजमहल का नक्शा बनाने वाले वास्तुकार की पत्नी को मरवा दिया था कि ताकि वह अपनी पत्नी की जुदाई के दर्द को महसूस कर सके और शाहजहां की पत्नी का एक भव्य मकबरा बना सके।
कलाकार ऐसे ही होते हैं-जुनूनी, अपनी धुन के पक्के, अपनी कला के लिए अंधे और तभी वे ऊंचाइयां छू पाते हैं। इस फिल्म का नायक आकाश भी ऐसा ही एक ‘अंधा’ और अपनी ‘धुन’ का पक्का पियानो प्लेयर है (वरना हिन्दी में ‘अंधाधुन’ कोई शब्द नहीं होता
)। उसकी ज़िंदगी सही जा रही है। पियानो बजाता है,
सिखाता है,
संयोग से एक गर्लफ्रैंड भी मिल जाती है। लेकिन एक दिन वह एक खून होते हुए ‘देख’ लेता है। अब अंधा आदमी ‘देख’ कैसे सकता है?
और यहीं से शुरू होती है छल,
कपट और धोखे की एक अंधी दौड़ जिसमें कोई भी पाक-साफ नहीं है। हर किसी के अपने छुपे हुए इरादे हैं,
स्वार्थ हैं। दूसरों को मात देकर खुद की जीत पक्की करने के इस शतरंजी खेल में ढेरों ट्विस्ट एंड टर्न्स हैं और यही घुमावदार मोड़ फिल्म के दौरान न सिर्फ आपको लगातार बांधे रखते हैं बल्कि एक पल के लिए भी आपको अपनी नज़रें इधर-उधर नहीं करने देते।
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
इतिहास के साथ दिक्कत सिर्फ यही नहीं है कि उसे अलग-अलग नजरिए से लिखा और लिखवाया गया बल्कि यह भी है कि उसे सत्तानशीनों की सुविधानुसार परोसा और पढ़ाया गया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को ही लें तो आमजन के लिए यह ज्यादातर गांधी और नेहरू के इर्द-गिर्द ही घूमता है। इनके विरोधी रहे नेताओं, सेनानियों को या तो इतिहास लेखकों ने महत्व नहीं दिया या फिर उनके लिखे को आम लोगों तक सुगमता से नहीं पहुंचाया गया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनकी आजाद हिन्द सेना के बारे में ही हम कितना जानते हैं? तिग्मांशु धूलिया की यह फिल्म ‘राग देश’ इस कमी को पूरा करने की दिशा में एक सार्थक और जरूरी कदम कही जा सकती है।