Showing posts with label jaideep ahlawat. Show all posts
Showing posts with label jaideep ahlawat. Show all posts

Sunday, 18 April 2021

रिव्यू-कामुकता और क्राइम की अजीब दास्तानें

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एंथोलॉजी यानी लगभग एक ही जैसे विषय पर कही गईं अलग-अलग कहानियों को एक ही फिल्म में पिरोना। हिन्दी सिनेमा वालों ने भी हिम्मत करके गाहे-बगाहे इस शैली को अपनाया है। नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई यह फिल्मअजीब दास्तान्सभी ऐसी ही चार दास्तानों को सामने ला रही है जो कमोबेश एक ही धागे से बंधी हुई हैं लेकिन इनमें आपस में कोई नाता नहीं है। असल में यह चार अलग-अलग निर्देशकों की बनाई चार शॉर्ट-फिल्मों का एक संकलन है जिसे एक ही थाली में रख कर परोसा गया है। हर किसी की अपनी-अपनी पसंद की फिल्म अलग-अलग हो सकती है। मगर आइए, पहले इनके गुण-दोषों की बात कर लें।

Saturday, 7 March 2020

रिव्यू-क्यों तारीफों के काबिल है ‘बागी 3’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एकदम डिफरेंट किस्म की फिल्म है यह। एक लड़का है, बचपन से ही बागी किस्म का। यहां तक कि अपने बाप को भी नाम से बुलाता है (हालांकि संस्कारी है, पर पता नहीं यह ऐब उसमें कहां से आया) जहां भी उसके भाई पर कोई मुसीबत आती है, यह उसे बचाने पहुंच जाता है। यहां डिफरेंट बात यह है कि यहां पर मुसीबत में बड़ा भाई घिरता है और बचाने का काम छोटा भाई करता है। कहिए, है एकदम ही अलग किस्म की कहानी...? तालियां...!

Friday, 10 August 2018

रिव्यू-फीकी जलेबी ‘विश्वरूप 2’

-दीपक दुआ...  (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
डियर कमल हासन,
2013 में जब आप विश्वरूपलेकर आए थे तो अपन ने उसे साढ़े तीन स्टार से नवाज़ा भी था। यह रहा उस फिल्म की समीक्षा का लिंक-
उस फिल्म के अंत में जब आप (मेजर विसाम अहमद काश्मीरी) ने यह साफतौर पर कह दिया था कि जब तक उमर ज़िंदा है या मैं, कुछ खत्म नहीं होगा, यह कहानी चलती ही रहेगी’, तो लगा था कि आपके दिमाग में ज़रूर आगे की कहानी होगी और जल्द ही आप उसे लेकर भी आएंगे। पर जब आपने विश्वरूप 2’ को लाने में साढ़े पांच साल लगा दिए तो शक होने लगा था कि आपके पास कहने-बताने को कुछ है भी या फिर सीक्वेल लाने का वह ऐलान खोखला ही था। और अब आपकी विश्वरूप 2’ को देख कर तो यही लगता है कि आपके पतीले में था कुछ नहीं। बस, आपने ज़ोर-ज़ोर से कड़छी हिलाई है ताकि लोग झांसे में जाएं।

रिव्यू-मसाले और गहराई ‘विश्वरूप’ (पार्ट-1) में

-दीपक दुआ...  (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
सब से पहले तो यही बात साफ हो जाए कि इस फिल्म में ऐसा एक भी सीन या संवाद नहीं है जिस पर कोई भी समझदार आदमी एतराज कर सके। अब आप चाहें तो यह सवाल उठा सकते हैं कि जो लोग ऐसी फिल्मों पर एतराज करते हैं, वे होते ही कितने समझदार हैं?
चलिए, बात आगे बढ़ाई जाए। हॉलीवुड से आने वाली फिल्मों में हमेशा यह दिखाया जाता है कि जब भी दुनिया के किसी भी हिस्से में किसी भी किस्म की-आतंकवादियों से, प्रकृति की तरफ से या यहां तक कि अंतरिक्ष की ओर से भी कोई मुसीबत आती है तो कोई कोई अमेरिकी हीरो ही उससे निबटता है और दुनिया को बचाने का महान काम करता है। कमल हासन ने अपनी इस फिल्म से हॉलीवुड की इस महानता को चुनौती दी है क्योंकि इस फिल्म का हीरो भारतीय है और अमेरिका को बचाने के उसके मिशन में अमेरिकी पुलिस, एफ.बी.आई. वगैरह-वगैरह उसके सहयोगी हैं।