एंथोलॉजी यानी लगभग एक ही जैसे विषय पर कही गईं अलग-अलग कहानियों को एक ही फिल्म में पिरोना। हिन्दी सिनेमा वालों ने भी हिम्मत करके गाहे-बगाहे इस शैली को अपनाया है। नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई यह फिल्म ‘अजीब दास्तान्स’ भी ऐसी ही चार दास्तानों को सामने ला रही है जो कमोबेश एक ही धागे से बंधी हुई हैं लेकिन इनमें आपस में कोई नाता नहीं है। असल में यह चार अलग-अलग निर्देशकों की बनाई चार शॉर्ट-फिल्मों का एक संकलन है जिसे एक ही थाली में रख कर परोसा गया है। हर किसी की अपनी-अपनी पसंद की फिल्म अलग-अलग हो सकती है। मगर आइए,
पहले इनके गुण-दोषों की बात कर लें।
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Sunday, 18 April 2021
रिव्यू-कामुकता और क्राइम की अजीब दास्तानें
Friday, 20 July 2018
रिव्यू-‘धड़क’ न तो ‘सैराट’ है न ‘झिंगाट’
-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
ऊंची जात की अमीर लड़की। नीची जात का गरीब लड़का। आकर्षित हुए, पहले
दोस्ती, फिर प्यार कर बैठे। घर वाले आड़े आए तो दोनों भाग गए। जिंदगी की कड़वाहट को करीब से देखा, सहा
और धीरे-धीरे सब पटरी पर आ गया। लेकिन...!
इस कहानी में नया क्या है, सिवाय
अंत में आने वाले एक जबर्दस्त ट्विस्ट के? कुछ
भी तो नहीं। फिर इसी कहानी पर बनी मराठी की ‘सैराट’
कैसे इतनी बड़ी हिट हो गई कि तमाम भाषाओं में उसके रीमेक बनने लगे। कुछ बात तो जरूर रही होगी उसमें। तो चलिए, उसका
हिन्दी रीमेक भी बना देते हैं। कहानी को महाराष्ट्र के गांव से उठा कर राजस्थान के उदयपुर शहर में फिट कर देते हैं। हर बात, हर
संवाद में ओ-ओ लगा देते हैं। थारो, म्हारो,
आयो, जायो, थे,
कथे, कोणी, तन्नै,
मन्नै जैसे शब्द डाल देते हैं (अरे यार, उदयपुर
जाकर देखो, लोग
प्रॉपर हिन्दी भी बोल लेते हैं। और हां, यह
‘पनौती’ शब्द
मुंबईया है, राजस्थानी
नहीं)। हां, गानों
के बोल हिन्दी वाले रखेंगे और संगीत मूल मराठी फिल्म वाला(ज्यादा मेहनत क्यों करें)। ईशान खट्टर और जाह्नवी कपूर जैसे मनभावन चेहरे, शानदार
लोकेशंस, रंग-बिरंगे सैट, उदयपुर
की खूबसूरती... ये सब मिल कर इतना असर तो छोड़ ही देंगे कि पब्लिक इसे देखने के लिए लपकी चली आए।
Saturday, 11 March 2017
रिव्यू-अपनों और सपनों के बीच भागती दुल्हनिया
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
खालिस मसाला फिल्मों का जमाना गया। अब तो मसाले के साथ मैसेज परोसने का दौर है। यह फिल्म (बद्रीनाथ की दुल्हनिया) भी यही कर रही है। दहेज के खिलाफ लंबा-चैड़ा डिस्क्लेमर देती है, नारी-मुक्ति की बात करती है, लड़कियों को सपने देखने और उड़ान भरने को कहती है, साथ ही मनोरंजन भी करती है। मगर अफसोस, यह सब छोटे-छोटे टुकड़ों में है और ये टुकड़े ज्यादा दमदार भी नहीं हैं।
खालिस मसाला फिल्मों का जमाना गया। अब तो मसाले के साथ मैसेज परोसने का दौर है। यह फिल्म (बद्रीनाथ की दुल्हनिया) भी यही कर रही है। दहेज के खिलाफ लंबा-चैड़ा डिस्क्लेमर देती है, नारी-मुक्ति की बात करती है, लड़कियों को सपने देखने और उड़ान भरने को कहती है, साथ ही मनोरंजन भी करती है। मगर अफसोस, यह सब छोटे-छोटे टुकड़ों में है और ये टुकड़े ज्यादा दमदार भी नहीं हैं।
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