लखनऊ की संध्या
का पति आस्तिक
शादी के पांच
महीने में ही
मर गया। कल
ही उसकी अंत्येष्टि
हुई है। लेकिन
संध्या को न
तो रोना आ
रहा है और
भूख भी जम
कर लग रही
है। उसे चाय
नहीं पेप्सी पीनी
है, गोलगप्पे खाने है।
अगले 13 दिन तक
घर में जमा
किस्म-किस्म के
लोगों की सोच
और नज़रों से
निबटना है। कुछ
पुराने हिसाब चुकता
करने है। कुछ
नए फैसले लेने
है। कुछ चीज़ों
पर मिट्टी डालनी
है तो कुछ
नए बीज भी
बोने हैं।
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Tuesday, 30 March 2021
रिव्यू-थोड़ी हाई थोड़ी फ्लैट ‘पगलैट’
Monday, 3 August 2020
रिव्यू-अमेज़िंग ‘शकुंतला देवी’ की नॉर्मल कहानी
पांच साल की एक बच्ची चुटकियों में गणित की मुश्किल से मुश्किल गणनाएं कर देती है। कभी स्कूल तक नहीं गई इस बच्ची ने देश-विदेश में अपने ‘मैथ्स शोज़’ के ज़रिए भरपूर नाम, शोहरत,
पैसा कमाया। कम्प्यूटर से भी तेज़ कैलकुलेशन करने के कारण उसे ‘ह्यूमैन कम्प्यूटर’ तक कहा गया। ‘गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड’ में उसका नाम भी आया। वह महान गणितज्ञ कहलाई, मशहूर ज्योतिषी बनीं, इंदिरा गांधी के विरुद्ध चुनाव में उतरी। उसने गणित, ज्योतिष,
समलैंगिकता पर किताबें लिखीं, कई उपन्यास लिखे। उसी की ज़िंदगी पर बनी है यह फिल्म। कहिए है न वह एक अमेज़िंग हस्ती...! काश,
कि यह फिल्म भी उतनी ही अमेज़िंग हो पाती।Saturday, 16 March 2019
रिव्यू-अरमान जगाती ‘फोटोग्राफ’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
‘मैडम,
बरसों बाद जब आप यह फोटो देखेंगी तो आपको अपने चेहरे पर यही धूप दिखाई देगी...।’
मैडम तो फोटो खिंचवा कर चली गई। गांव में बैठी अपनी दादी को बहलाने के लिए फोटोग्राफर ने इसी मैडम की तस्वीर दादी को भेज दी कि मैंने अपने लिए यह लड़की पसंद कर रखी है। उसी वक्त पीछे ‘नूरी’ फिल्म का गाना बज रहा था, सो लड़की का नाम भी बता दिया-नूरी। लेकिन दादी गांव से उठ कर सीधे मुंबई आ धमकी-मिलवाओ नूरी से। फोटोग्राफर के कहने पर मैडम मान गई, दादी से मिलती रही और कहानी आगे चलती रही।
Thursday, 18 October 2018
रिव्यू-‘बधाई हो’, बढ़िया फिल्म हुई है...!
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
दिल्ली का मध्यवर्गीय खुशहाल परिवार। पिता रेलवे में,
मां घर में। बड़ा बेटा नौकरी में,
छोटा बारहवीं में। दादी खटिया पर। तभी पता चला कि घर में एक नन्हा मेहमान आने वाला है। मां,
फिर से मां बनने वाली है। भूचाल आ गया जी। बेटों ने मां-बाप से मुंह मोड़ लिया, दादी ने बेटे-बहू से। परिवार, मौहल्ले, बिरादरी, समाज में छिछालेदार होने लगी, सो अलग। लेकिन अंत भला,
तो सब भला।
दिल्ली का मध्यवर्गीय खुशहाल परिवार। पिता रेलवे में,
मां घर में। बड़ा बेटा नौकरी में,
छोटा बारहवीं में। दादी खटिया पर। तभी पता चला कि घर में एक नन्हा मेहमान आने वाला है। मां,
फिर से मां बनने वाली है। भूचाल आ गया जी। बेटों ने मां-बाप से मुंह मोड़ लिया, दादी ने बेटे-बहू से। परिवार, मौहल्ले, बिरादरी, समाज में छिछालेदार होने लगी, सो अलग। लेकिन अंत भला,
तो सब भला।Saturday, 29 September 2018
रिव्यू-‘पटाखा’ फूटा मगर धीमे से
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अगर आप विशाल भारद्वाज की फिल्मों के फैन हैं तो आपने इस फिल्म का ट्रेलर जरूर देखा होगा। और अगर आपने इस फिल्म का ट्रेलर देखा है तो आपको इंटरवल तक की फिल्म देखने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। जी हां,
इंटरवल तक की फिल्म के सारे अहम दृश्य ट्रेलर में आ चुके हैं। आप चाहें तो इंटरवल तक एक अच्छी नींद ले सकते हैं। अब रही बात इंटरवल के बाद की। तो यह हिस्सा भी आपको तभी पसंद आएगा जब आपके अंदर विशाल भारद्वाज की फिल्मों के लिए मजनू-रांझा वाली दीवानगी हो। वरना इस दौरान भी आप सो सकते हैं। अब पैसे खर्च के थिएटर में सोने ही जाना है,
तो आपकी मर्जी।
अगर आप विशाल भारद्वाज की फिल्मों के फैन हैं तो आपने इस फिल्म का ट्रेलर जरूर देखा होगा। और अगर आपने इस फिल्म का ट्रेलर देखा है तो आपको इंटरवल तक की फिल्म देखने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। जी हां,
इंटरवल तक की फिल्म के सारे अहम दृश्य ट्रेलर में आ चुके हैं। आप चाहें तो इंटरवल तक एक अच्छी नींद ले सकते हैं। अब रही बात इंटरवल के बाद की। तो यह हिस्सा भी आपको तभी पसंद आएगा जब आपके अंदर विशाल भारद्वाज की फिल्मों के लिए मजनू-रांझा वाली दीवानगी हो। वरना इस दौरान भी आप सो सकते हैं। अब पैसे खर्च के थिएटर में सोने ही जाना है,
तो आपकी मर्जी।
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