Showing posts with label sushant singh rajput. Show all posts
Showing posts with label sushant singh rajput. Show all posts

Saturday, 25 July 2020

रिव्यू--हल्की-फुल्की सी, ठंडी कुल्फी सी ‘दिल बेचारा’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
झारखंड का शहर जमशेदपुर। किज़ी बासु नाम की लड़की। कैंसर है उसे। हर जगह ऑक्सीज़न का सिलैंडर उठाए फिरती है। उदास रहती है। कब्रिस्तान में जाकर अनजान मृतकों के रिश्तेदारों के गले लग कर उन्हें सांत्वना देती है। इसी शहर में रहता है मैनी यानी इमैन्युअल राजकुमार जूनियर। इसे भी कैंसर है। एक टांग नकली है फिर भी बेहद ज़िंदादिल, खुशमिज़ाज, मसखरा किस्म का लड़का है। ये दोनों मिलते हैं। मैनी किज़ी से फ्लर्ट करता है। किज़ी धीरे-धीरे उसे अपने करीब आने देती है। इनमें प्यार भी हो जाता है मगर एक दिन...!

Friday, 6 September 2019

रिव्यू-जूझना सिखाते हैं ये ‘छिछोरे’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
ज़िंदगी से हार मानने को तैयार अपने बेटे को हौसला देने के लिए एक बाप उसे अपने कॉलेज और होस्टल के दिनों की कहानी सुना रहा है। धीरे-धीरे इस कहानी के 25-26 साल पुराने किरदार भी जुटते हैं जो उसे बताते हैं कि आज कामयाबी के आसमान पर बैठे ये लोग कभी कितने बड़े लूज़र थे और कैसे इन्होंने मुश्किलों का सामना किया।

Friday, 1 March 2019

रिव्यू-धूल में लोटती ‘सोनचिरैया’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
बागी का धरम क्या है, दद्दा...?’
जूनियर डाकू (ओह सॉरी, बीहड़ में बागी होत हैं, डकैत मिलते हैं पार्लामैंट में) लखना जब सीनियर बागी मानसिंह से यह सवाल पूछता है तो उसे जवाब नहीं मिलता। कुछ देर बाद यही सवाल वह दूसरे सीनियर बागी से पूछता है। उसे जवाब मिलता है-बागी का धरम होत है अपनी जात-बिरादरी की रच्छा करना। तो, इस फिल्म में हर बागी अपनी जात-बिरादरी के गैंग में रह कर अपनी जात-बिरादरी वालों की रच्छा कर रहा है और सोच रहा है कि वह बहुत महान काम कर रहा है। लेकिन असल में वह भी जानता है कि उसकी यह ज़िंदगी किसी नरक से कम नहीं। न खाने का पता, न हगने का। कई-कई दिन सोने को नहीं मिलता और पुलिस है कि कुत्तों की तरह सूंघती फिरती है।

Saturday, 8 December 2018

रिव्यू-‘केदारनाथ’-उफ्फ ये ‘शेखुलर’ मोहब्बत

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अगर आपको पता चले कि 
2013 में उत्तराखंड के केदारनाथ में आई उस प्रलयकारी बाढ़ के पीछे एक बड़ा कारण यह भी था कि उस रात मोहब्बत के दुश्मनों ने सच्चा प्यार करने वाले एक जोड़े को अलग कर दिया था, तो कैसा लगेगा? बात फिल्मी है लेकिन अगर कायदे सेकही जाए तो आपके भीतर छुपे प्रेमी-मन को झंझोड़ सकती है, भावुक कर सकती है कि उस रात उनके बिछड़ने पर बादल भी कुछ इस तरह रोए थे कि हज़ारों को लील गए थे। लेकिन कायदे सेकही जाए तब ! इस फिल्म में और सब कुछ है, वो कायदा’, वो सलीकाही नहीं है जो किसी कहानी को आपके दिल की गहराइयों तक कुछ इस तरह से ले जाता है कि आप उस के साथ बहने लगते हैं।

Friday, 9 June 2017

रिव्यू-कुछ भी नहीं है यह ‘राब्ता’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पंजाब से हंगरी नौकरी करने गए एक लड़के को नौकरी से ज्यादा छोकरियों में दिलचस्पी है। इस बंदे को वहां भी एक हिन्दुस्तानी लड़की मिल जाती है। लेकिन इससे पहले कि इनकी कहानी आगे बढ़े, एक और बंदा बीच में जाता है और साथ ही जाता है इन तीनों के पिछले जन्म का एक अनोखा किस्सा।

बेशक यह कहानी दिलचस्प है। आठ सौ साल पहले एक धूमकेतु धरती के करीब से गुजरा था तो प्यार और तकरार की एक कहानी घटी थी। आठ सौ साल बाद जब वही धूमकेतु फिर धरती के करीब आता है तो उसी अधूरी कहानी के किरदार फिर मिलते हैं और उस कहानी को पूरा करते हैं।

दिनेश विजन बतौर निर्माता बीईंग सायरस’, ‘लव आजकल’, ‘कॉकटेल’, ‘एजेंट विनोद’, ‘हिन्दी मीडियमजैसी फिल्में बना चुके हैं और माना जा सकता है कि दर्शकों के मिजाज को भांपने में वह माहिर हो चुके होंगे इसीलिए उन्होंने खुद निर्देशक बन कर यह फिल्म बनाने का इरादा किया। लेकिन इरादा करने और उस इरादे को पूरा करने में जो फर्क होता है, वह इस फिल्म को देखते हुए साफ महसूस होता है जहां पहले हिस्से में घटनाएं कम घटती हैं और बकबक ज्यादा होती है। इस बकबक को पार्कों, खंडहरों, थिएटरों के कोनों में एक-दूसरे से चिपक कर बैठने वाले जोड़े शायद पसंद कर लें। फिर दूसरे हिस्से में घटनाएं तेजी से घटती हैं लेकिन उन्हें लेखक का सपोर्ट नहीं मिल पाता। कई बार ऐसा महसूस होता है कि दिनेश ने एडिटरों को भी खुल कर काम नहीं करने दिया वरना यह फिल्म दो घंटे 35 मिनट लंबी होती।

अब हमारी हिन्दी फिल्मों में नायक-नायिका को मुलाकात के पहले ही दिन किस्स करते और दूसरे दिन बिस्तर पर पाया जा सकता है। दुनिया का कोई भी देश हो, इन्हें हिन्दी बोलने वाले लोग हर जगह मिल जाते हैं और एक हम हैं कि हाय हिन्दी का रोना रोते रहते हैं। आठ सौ साल पहले ये लोग किस जगह, किस देश, किस सभ्यता में लड़-मर रहे थे, फिल्म बनाने वाले आपको बताना जरूरी नहीं समझते। जरूरी तो वे खैर यह भी नहीं समझते कि इस जन्म के तीन प्रमुख किरदारों में से दो के आगे-पीछे कौन है, वे कहां से आए वगैरह-वगैरह। और अगर यह फिल्म देखते समय आपको मगधीरायाद आए तो हमारी बला से। जब निर्देशक ने परवाह नहीं की तो हम क्यों करें?

सुशांत सिंह राजपूत जंचते हैं। हालांकि वह बहुत बार ओवर हो जाते हैं। कृति सैनन सुंदर लगती हैं लेकिन अभिनय के मामले में वह औसत ही दिखती हैं। जिम सरभ कुछ एक जगह असर छोड़ते हैं। वरुण शर्मा को कायदे का किरदार ही नहीं मिला। दरअसल किरदार खड़े करने में तो लेखक बुरी तरह से चूके हैं। राजकुमार राव को ऐसा रोल दिया कि कोई पहचान ही पाए। संगीत अच्छा है। एक गीत में दीपिका पादुकोण भी दिखी हैं। फिल्म बुरी तरह से बोर करती है और दर्शकों से कोई राब्ता जोड़ पाने में नाकाम रह जाती है।
अपनी रेटिंग-डेढ़ स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्मपत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज़ पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)