छत्तीसगढ़ का एक छोटा-सा शहर। यहां हर कोई हर किसी को जानता है। लेकिन बिल्लू यानी प्रेम कुमार यादव को अपनी खुद की पहचान बनानी है। सो,
पिता की तरह जंगल विभाग की चपरासीगिरी न करके वह शहर से बाहर वाली सड़क पर पान का खोखा लगा लेता है। सड़क वीरान है और बिल्लू का धंधा भी। पर तभी सामने वाले इकलौते घर में रहने आए इंजीनियर साहब की जवान होती लड़की के चक्कर में शहर भर के लौंडे-लपाड़ों की भीड़ वहां लगने लगती है। बिल्लू का धंधा चमकने लगता है और उसके अरमान भी। पहचान तो खैर, उसकी बन ही जाती है।Wednesday, 15 July 2020
रिव्यू-छोटे शहर की लवली-सी कहानी ‘चमन बहार’
छत्तीसगढ़ का एक छोटा-सा शहर। यहां हर कोई हर किसी को जानता है। लेकिन बिल्लू यानी प्रेम कुमार यादव को अपनी खुद की पहचान बनानी है। सो,
पिता की तरह जंगल विभाग की चपरासीगिरी न करके वह शहर से बाहर वाली सड़क पर पान का खोखा लगा लेता है। सड़क वीरान है और बिल्लू का धंधा भी। पर तभी सामने वाले इकलौते घर में रहने आए इंजीनियर साहब की जवान होती लड़की के चक्कर में शहर भर के लौंडे-लपाड़ों की भीड़ वहां लगने लगती है। बिल्लू का धंधा चमकने लगता है और उसके अरमान भी। पहचान तो खैर, उसकी बन ही जाती है।Saturday, 11 July 2020
ओल्ड रिव्यू-देस की बात, लोगों की बात ‘स्वदेस’ में
‘प्रहार’ के अंत में मेजर चव्हाण कहते हैं कि देश का मतलब क्या है?
नदियां, पहाड़, सड़कें, इमारतें बस। और लोग कहां हैं?
आशुतोष गोवारीकर की यह फिल्म इन्हीं लोगों के बारें में बात करती है,
हम लोगों के बारे में बात करती है। वह बात करती है जिसे करना बॉक्स-ऑफिस की नज़र से जोखिम भरा हो सकता है लेकिन एक प्रतिबद्ध और जागरूक फिल्मकार और नागरिक के तौर पर ऐसी बातें होनी चाहिएं, होती रहनी चाहिएं।Tuesday, 7 July 2020
‘गर्म हवा’ वाले एम.एस. सत्यु ने मुझे जो खत लिखा
-दीपक दुआ...अपने पिछले आलेख में मैंने ‘गर्म हवा’ जैसी कालजयी फिल्म बनाने वाले एम.एस. सत्यु के उस खत का ज़िक्र किया था जो उन्होंने मेरे खत के जवाब में मुझे लिखा था और उसके करीब 17 साल बाद गोआ में मैंने उन्हें इसके लिए शुक्रिया कहा था। (वह आलेख यहां क्लिक करके पढ़ें)
दरअसल वह पत्र मैंने सत्यु साहब को अपने पत्रकारिता के कोर्स के प्रोजेक्ट के सिलसिले में एक प्रश्नावली की शक्ल में भेजा था जिसमें मैंने ‘कला सिनेमा’ और ‘व्यावसाहिक सिनेमा’ के वर्गीकरण, सिनेमा में आते बदलाव, उन्हें मिलते सरकारी प्रश्रय, सिनेमा के भविष्य आदि पर सवाल पूछे थे और सत्यु साहब ने प्रश्नावली के हर सवाल का अलहदा जवाब देने की बजाय अपने खत में उन सारे बिंदुओं पर अपनी बात रखी थी। उस पत्र का हिन्दी अनुवाद यह रहा :-
Monday, 6 July 2020
जब मैंने एम.एस. सत्यु को किया 17 साल पुराना शुक्रिया
-दीपक दुआ...
एम.एस. सत्यु-‘गर्म हवा’ वाले एम.एस. सत्यु। सिर्फ यही एक फिल्म काफी है उनका परिचय देने के लिए,
उन्हें विश्व सिनेमा के इतिहास में अमरत्व प्रदान करने के लिए। वही मैसूर श्रीनिवास सत्यु आज 6 जुलाई को नब्बे के हो गए। उन्हीं से जुड़ा मेरा एक यादगार संस्मरण जब मैंने उनसे कहा था-‘सर आपको 17 साल पुराना एक शुक्रिया अदा करना है...!’
Saturday, 4 July 2020
वेब-रिव्यू : अच्छा, टाइम-पास एंटरटेनमैंट देती ‘हंड्रेड’
नेत्रा पाटिल को जाना है स्विट्जरलैंड लेकिन उसकी किस्मत में लिखी है एक सरकारी दफ्तर की क्लर्की। ए.सी.पी. सौम्या शुक्ला खुद को समझती है जेम्स बॉण्ड लेकिन डिपार्टमैंट ने उसे बना रखा है आइटम गर्ल। दोनों के सपने जुदा, दुनिया जुदा, ज़िंदगी जुदा, ज़िंदगी जीने का ढंग जुदा। एक जगह ये दोनों मिलती हैं और फिर साथ चलने लगती हैं। दरअसल नेत्रा मरने वाली है। उसके पास सिर्फ हंड्रेड डेज़ (सौ दिन) हैं। इस दौरान वह वो सब कुछ कर लेना चाहती है,
जो उसने अभी तक नहीं किया। उसे अपनी बची हुई ज़िंदगी में एक्साइटमैंट चाहिए और यह एक्साइटमैंट उसे देती है ‘सौम्या मईडम’ अपनी मुखबिर बना कर।
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