Tuesday, 25 September 2018

रिव्यू-नदी और सागर का प्यार है ‘वन्स अगेन’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
एक नदी है। अकेली बहे जाती है। दूसरों को सींचती हुई। एक समंदर है। विशाल, अथाह मगर वीरान, खारा। चाहता है कि नदी आकर उसका साथ निभाए, उसमें ज़रा मिठास घोले। पर नदी हिचकती है। पास आना चाहते हुए भी समंदर में मिलने से डरती है। डरती है कि लोग क्या कहेंगे? या शायद कहीं उसका वजूद न मिट जाए।

Saturday, 22 September 2018

रिव्यू-मैसेज गुल कॉमेडी चालू

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
उत्तराखंड का टिहरी शहर। तीन गहरे दोस्त। सुंदर (दिव्येंदु शर्मा), सुशील (शाहिर कपूर) और नॉटी (श्रद्धा कपूर)। जान छिड़कते हैं एक-दूसरे पर। लेकिन जब नॉटी यानी ललिता नौटियाल अपने लिए सुंदर मोहन त्रिपाठी को चुन लेती है तो सुशील कुमार पंत चिढ़ जाता है और इनसे दूर जाने लगता है। पर जब अपनी फैक्ट्री की बिजली का बिल 54 लाख रुपए आने पर सुंदर खुदकुशी कर लेता है तो वकील सुशील अपने मरहूम दोस्त को न्याय दिलाने के लिए बिजली कंपनी पर केस ठोक देता है।

Friday, 21 September 2018

रिव्यू-इस ‘मंटो’ को समझने के लिए उस मंटो को समझना होगा

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
‘अगर आप मेरे अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते... तो इसका मतलब यह है कि ज़माना ही नाकाबिले बर्दाश्त है...।’

इतनी बेबाकी, ठसक और शिद्दत के साथ सआदत हसन मंटो नाम के जिस शख्स ने उम्र भर अपनी बात कही, वह उम्र भर किस संघर्ष से होकर गुजरता रहा और अपने आखिरी दौर में वह किस कदर मजबूर था, यह भला कौन जानता है? और अगर इन संघर्षों और मजबूरियों से उसका साबका न हुआ होता तो क्या यह मुमकिन नहीं कि वह सिर्फ 42 की उम्र में दुनिया न छोड़ता...?

Thursday, 20 September 2018

रिव्यू-रूखी-सूखी ‘पाखी’

-दीपक दुआ...
एक कोठा। उसका एक खूंखार मालिक। कुछ लड़कियां। कोई हंस कर तो कोई रो कर अपने ‘काम’ को करती लड़कियां। वहां लड़कियां बेच कर जाते हैं लोग। कोई अपनी प्रेमिका, कोई भतीजी तो किसी और को बेच जाता है वहां। लेकिन जब वहां एक बच्ची लाई जाती है तो उसे वहां से निकालने के लिए जुट जाते हैं सब लोग।

फिल्म की कहानी बुरी नहीं। लेकिन दिक्कत है इस कहानी को फैलाने के लिए लिखी गई स्क्रिप्ट के साथ। इस कदर पैदल, धीमी और दोहराव लिए हुए है यह, कि शुरू के दस मिनट के बाद इसे झेलना भारी हो जाता है। 

Saturday, 15 September 2018

रिव्यू-सरस छे पर हल्की छे ‘मित्रों’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अहमदाबाद में एक निठल्ला लड़का। है तो इंजीनियर लेकिन शेफ बनना चाहता है। पर उसके पप्पा चाहते हैं कि वो एक अमीर आदमी का घरजंवाई बन जाए ताकि उनकी मुसीबत टले। इसी शहर की एक होशियार लड़की। बिजनेस करना चाहती है, पढ़ने के लिए बाहर जाना चाहती है। पर उसके पप्पा चाहते हैं कि वो शादी करे और यहां से टले। उधर वो अमीर आदमी चाहता है कि उसका होने वाला (निठल्ला) दामाद पहले खुद को होशियार साबित करे। सो, यह निठल्ला लड़का और वो होशियार लड़की मिल कर एक बिज़नेस शुरू करते हैं जो चल निकलता है। अब लड़का-लड़की साथ होंगे तो ज़ाहिर है, प्यार-व्यार तो होगा ही। अंत में सारे पप्पा लोग भी मान ही जाते हैं।