सुलोचना बारहवीं फेल है। बैंक में काम करने वाली ‘कामयाब’ बहनों की इस छोटी बहन के पति की सीमित आमदनी है। लेकिन वह अपने घर-परिवार में खा-पीकर मस्त रहती है। साथ वाले फ्लैट में रहती एयरहोस्टेस लड़कियों को देख कर उसकी आंखों में भी चमकीले सपने तैरते हैं। उसे जीतना आता है। ‘मैं कर सकती है’ और ‘मुझे हर काम में मजा आता है’ जैसा उसका एटिट्यूड उसे चैन से नहीं बैठने देता। इसलिए कभी वह कॉलोनी की गायन-प्रतियोगिता में तो कभी नींबू-चम्मच रेस में तो कभी रेडियो पर पूछे जाने वाले सवाल का जवाब दे कर इनाम और इज्जत हासिल करती रहती है। ऐसे में सुलोचना को मिल जाता है रेडियो पर एक लेट-नाइट शो में काम करने का ऑफर, और वह बन जाती है लोगों की रातों को जगाने, उनके सपनों को सजाने वाली आर.जे. सुलु। पर क्या उसका परिवार उसके इस रूप को स्वीकार कर पाता है?सुरेश त्रिवेणी बतौर निर्देशक अपनी इस पहली फिल्म से असर छोड़ते हैं। गीत-संगीत फिल्म के माहौल में फिट है। एक्टिंग के मामले में जहां विद्या बालन हर बार की तरह प्रभावित करती हैं वहीं नेहा धूपिया भी चौंकाती हैं। बल्कि अंत के एक सीन में तो वह विद्या पर भारी पड़ती हैं। मानव कौल ने जिस तरह से खुद को अंडरप्ले करते हुए विद्या के पति के किरदार को निभाया है, वह तारीफ के हकदार हैं। विजय मौर्य ने खुद को इतना हल्का रोल क्यों दिया? वह कमाल के एक्टर हैं और हम उन्हें और ज्यादा देखना चाहते हैं। विद्या की बड़ी बहनों के किरदार में आईं सीमा तनेजा और सिंधु शेखरन का काम जानदार है।





