15 साल की मलाला अपने पिता से पूछती है-‘तालिबान की आखिर स्कूल से क्या दुश्मनी है?’ जवाब मिलता है-‘क्योंकि जो शिक्षित होते हैं, उन्हें फिर जिहाद या गलत हदीस (सीख) की तरफ ले जाना नामुमकिन होता है।’
Saturday, 1 February 2020
रिव्यू-तालीम और तालिबान के बीच अटकी ‘गुल मकई’
Saturday, 25 January 2020
रिव्यू-अरमानों से हल्का-सा ‘पंगा’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
कभी थी वो देश की कबड्डी टीम की कप्तान। आज उसके पास रेलवे की नौकरी है। पति भी रेलवे में इंजीनियर। एक प्यारा-सा बेटा। रेलवे का दिया घर। खुशहाल ज़िंदगी। क्या नहीं है उसके पास। लेकिन उसे तो ज़िंदगी से पंगा लेना है। बेटे के अरमान पूरे करने के लिए कबड्डी में वापस आई जया निगम को अब कबड्डी में अपनी भी खुशी दिखाई देने लगती है। लेकिन यह पंगा इतना आसान थोड़े ही है।
कभी थी वो देश की कबड्डी टीम की कप्तान। आज उसके पास रेलवे की नौकरी है। पति भी रेलवे में इंजीनियर। एक प्यारा-सा बेटा। रेलवे का दिया घर। खुशहाल ज़िंदगी। क्या नहीं है उसके पास। लेकिन उसे तो ज़िंदगी से पंगा लेना है। बेटे के अरमान पूरे करने के लिए कबड्डी में वापस आई जया निगम को अब कबड्डी में अपनी भी खुशी दिखाई देने लगती है। लेकिन यह पंगा इतना आसान थोड़े ही है।Friday, 24 January 2020
रिव्यू-मकसद में कामयाब ‘स्ट्रीट डांसर 3डी’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
सबसे पहले तो यह जान लीजिए कि अगर डिज़्नी पिक्चर्स वाले भारत से अपना बिस्तरा उठा कर नहीं भागते तो इस फिल्म का नाम ‘एबीसीडी 3’
होना था। ‘एबीसीडी’
सीरिज़ की पिछली दो फिल्मों जैसी ही कहानी, वही कलाकार, वही मुकाबले,
वही डांस... तो फिर नया क्या है?
नया है लंदन शहर, नया है कहानी में आने वाला एक ट्विस्ट। क्या...?
आइए,
जानते हैं।
सबसे पहले तो यह जान लीजिए कि अगर डिज़्नी पिक्चर्स वाले भारत से अपना बिस्तरा उठा कर नहीं भागते तो इस फिल्म का नाम ‘एबीसीडी 3’
होना था। ‘एबीसीडी’
सीरिज़ की पिछली दो फिल्मों जैसी ही कहानी, वही कलाकार, वही मुकाबले,
वही डांस... तो फिर नया क्या है?
नया है लंदन शहर, नया है कहानी में आने वाला एक ट्विस्ट। क्या...?
आइए,
जानते हैं।Saturday, 18 January 2020
रिव्यू-थमी-थमी फिल्म है ‘जय मम्मी दी’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
स्कूल-कॉलेज के ज़माने की दो सहेलियां किसी बात पर ऐसी बिगड़ीं कि दुश्मन बन गईं। लेकिन शादी के बाद भी रहती एक-दूसरे के पड़ोस में हैं। यहां से शिफ्ट होकर दोनों नए घर में गईं तो वो घर भी चिपके हुए निकले। वाह रे राईटर साहब, आपकी समझदानी को म्यूजियम में रखूं। खैर...! किस बात पर ये दोनों ऐसी पक्की दुश्मन बनी थीं, यह पूरी फिल्म में सामने नहीं आता। और जब अंत में सामने आता है तो दिल ढूंढता है चुल्लू भर पानी, कि मुंह धो कर नींद भगा लें। दिक्कत यह है कि इन दोनों के बेटे-बेटी को एक-दूजे से प्यार हो जाता है। क्यों और कैसे? यह राईटर साहब नहीं बताना चाहते, उनकी मर्ज़ी। अब इन दोनों ने आपस में करनी है शादी लेकिन अपनी-अपनी मम्मियों के आगे इनकी ही नहीं इनके बापों की भी नहीं चलती। इनकी मम्मियों की तो... जय।
स्कूल-कॉलेज के ज़माने की दो सहेलियां किसी बात पर ऐसी बिगड़ीं कि दुश्मन बन गईं। लेकिन शादी के बाद भी रहती एक-दूसरे के पड़ोस में हैं। यहां से शिफ्ट होकर दोनों नए घर में गईं तो वो घर भी चिपके हुए निकले। वाह रे राईटर साहब, आपकी समझदानी को म्यूजियम में रखूं। खैर...! किस बात पर ये दोनों ऐसी पक्की दुश्मन बनी थीं, यह पूरी फिल्म में सामने नहीं आता। और जब अंत में सामने आता है तो दिल ढूंढता है चुल्लू भर पानी, कि मुंह धो कर नींद भगा लें। दिक्कत यह है कि इन दोनों के बेटे-बेटी को एक-दूजे से प्यार हो जाता है। क्यों और कैसे? यह राईटर साहब नहीं बताना चाहते, उनकी मर्ज़ी। अब इन दोनों ने आपस में करनी है शादी लेकिन अपनी-अपनी मम्मियों के आगे इनकी ही नहीं इनके बापों की भी नहीं चलती। इनकी मम्मियों की तो... जय।Monday, 13 January 2020
Subscribe to:
Posts (Atom)

